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माया देवी विश्वविद्यालय में मृदा एवं जल संरक्षण पर कार्यशाला: नवाचारी तकनीकों पर जोर

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान

जलवायु संकट से निपटने में मृदा और जल संरक्षण की अहम भूमिका: डॉ. अम्बरीश कुमार

सतत कृषि और जल संरक्षण के लिए नवाचार जरूरी: प्रो. तृप्ति जुयाल सेमवाल

*माया देवी विश्वविद्यालय में मृदा एवं जल संरक्षण में नवाचार विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन*
*वैज्ञानिक एवं नवाचारी संरक्षण तकनीकों को अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर दिया गया जोर*
माया देवी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी द्वारा विद्यार्थियों एवं शिक्षकों में मृदा एवं जल संसाधनों के संरक्षण, सतत प्रबंधन तथा इनके वैज्ञानिक उपयोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से *मृदा एवं जल संरक्षण में नवाचार’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया*। कार्यशाला में मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, जलागम प्रबंधन, जलवायु-सहिष्णु कृषि, भूमि क्षरण नियंत्रण तथा प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत चर्चा की गई।


कार्यशाला का शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता डॉ. अम्बरीश कुमार प्रधान वैज्ञानिक आईसीएआर–भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान देहरादून, विश्वविद्यालय की वाइस प्रेसिडेंट प्रो. डॉ. तृप्ति जुयाल सेमवाल, वाइस चांसलर प्रो. डॉ. आशीष सेमवाल तथा डीन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी प्रो. डॉ. महेंद्र सिंह पाल द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के डीन प्रो. डॉ. महेंद्र सिंह पाल ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण और जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक एवं नवाचारी संरक्षण तकनीकों को अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय की *वाइस प्रेसिडेंट प्रो. डॉ. तृप्ति जुयाल सेमवाल ने कहा कि मृदा और जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि मानव जीवन, कृषि अर्थव्यवस्था और भविष्य की खाद्य सुरक्षा के आधार हैं। जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और जल संकट जैसी चुनौतियों के बीच विद्यार्थियों एवं युवा शोधकर्ताओं को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और नवाचारी दृष्टिकोण अपनाना होगा*। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों को कक्षा-कक्ष की शिक्षा से आगे बढ़कर वास्तविक पर्यावरणीय एवं कृषि चुनौतियों को समझने और उनके समाधान तलाशने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी द्वारा इस महत्वपूर्ण विषय पर कार्यशाला आयोजित करने की सराहना की।
*कार्यशाला के मुख्य वक्ता डॉ. अम्बरीश कुमार, प्रधान वैज्ञानिक, ICAR-IISWC ने मृदा एवं जल संरक्षण, जलागम प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य सुधार, वर्षा जल संचयन, जल उपयोग दक्षता, मृदा अपरदन नियंत्रण, जलवायु-सहिष्णु कृषि तथा सतत भूमि प्रबंधन जैसे विषयों पर विस्तृत एवं उपयोगी जानकारी प्रदान की। उन्होंने भूमि क्षरण, मृदा उर्वरता में कमी और बढ़ते जल संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिक, नवाचारी तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संरक्षण तकनीकों को अपनाने पर विशेष जोर दिया।उन्होंने एकीकृत जलागम प्रबंधन, कुशल सिंचाई पद्धतियों, मृदा में नमी संरक्षण, वनस्पति आधारित उपायों, समोच्च तकनीकों, संरक्षण कृषि तथा प्रकृति-आधारित समाधानों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इन तकनीकों के प्रभावी उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करने के साथ-साथ कृषि उत्पादकता, जल उपयोग दक्षता तथा किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार किया जा सकता है।*
विश्वविद्यालय के *वाइस चांसलर प्रो. डॉ. आशीष सेमवाल ने कहा कि सतत कृषि एवं प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रबंधन वर्तमान समय की प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। मृदा की उर्वरता बनाए रखना, जल का कुशल उपयोग करना तथा भूमि एवं जल के क्षरण को रोकना केवल कृषि क्षेत्र की जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है*।
कार्यशाला ने यह स्पष्ट किया कि कृषि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। वैज्ञानिक तकनीकों, स्थानीय ज्ञान और आधुनिक नवाचारों के समन्वय से मृदा एवं जल संसाधनों का अधिक प्रभावी तथा दीर्घकालीन संरक्षण संभव है। साथ ही, विद्यार्थियों में प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी और सतत विकास की भावना विकसित करना भविष्य की कृषि व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रज्वल प्रधान ने मुख्य अतिथि डॉ. अम्बरीश कुमार, विश्वविद्यालय की वाइस प्रेसिडेंट प्रो. डॉ. तृप्ति जुयाल सेमवाल, वाइस चांसलर प्रो. डॉ. आशीष सेमवाल, रजिस्ट्रार श्रीमती अंबिका जुयाल, डीन एकेडमिक्स प्रो. डॉ. आर.बी. सिंह, डीन स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी प्रो. डॉ. महेंद्र सिंह पाल सहित सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का सफल आयोजन के लिए आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. विनय, डॉ. शिवानी, डॉ. शुभम, डॉ. साहिल, डॉ. गुलफिशन सहित स्कूल ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी के शिक्षकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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