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दूध बेचने वाला वीरू बना अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल खिलाडी : डॉ विरेन्द्र सिंह रावत ने संघर्षों से पाया मुकाम

 

कहते है ना तपस्या और त्याग इंसान को एक दिन महान इंसान बनाती है आज हम आपको एक ऐसे शख्स की जीवनी पर प्रकाश डाल रहे है जिसने 19 एक्सीलेंट के बाद भी हार नहीं मानी और बस सकारात्मक रहकर लगा रहा रात दिन उत्तराखंड के निर्धन, होनहार खिलाड़ियों को तराशने मे जो बने विरेन्द्र सिंह रावत से डॉ विरेन्द्र सिंह रावत एक खिलाडी रेफरी कोच एक युवा नई सोच के साथ आज भी 57 साल की उम्र मे लगा है त्याग और तपस्या करने मे
एक पहाड़ी की जीवनी
विरेन्द्र सिंह रावत उर्फ़ वीरू का जन्म 14 फरवरी 1970 को चोबट्टाखाल विधानसभा के सतपुली, पाटीसेंण,जैतूलसियु पट्टी, गांव कुलासु मे हुवा था पिताजी स्वर्गीय केप्टेन श्री चंद्र सिंह रावत प्रथम गढ़वाल राइफल्स फ़ौज मे सिपाही के पद पर थे चार भाई एक बहन मे सबसे छोटा था वीरु घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी एक छोटे से 10 बाई 10 फिट के झोपडी वाले कमरे मे रहते थे।


ज़ब वीरू पैदा हुवा तो उनकी माताजी ने बताया था की ज़ब तुम पैदा हुवे थे तुम्हारे पिताजी के साथ 5 किलोमीटर पैदल चलकर पाटीसेंड वैद के पास गए वैद ने मना कर दिया की मेरे बस का नहीं है फिर वापस 5 किलोमीटर जंगल के रास्ते पैदल चलकर रात को आए और घर आते ही रात 10 बजकर 45 मिनट मे 15 मिनट मे वीरू पैदा तो हुवा लेकिन उल्टा हुवा माताजी ने बहुत कष्ट सहा, जीवन की सुरुवात हुई 6 महीने का ज़ब वीरू हुवा तब आर्मी के जैरकिन ( ड्रम ) जिसमे पानी भरा था उसको पकड़ने के लिए खड़ा हुवा और सीधे गिर गया वीरू की उंगलियों पर और पिचक गयी जिससे बहुत कष्ट हुवा और इलाज ना हो सका जो आज भी है उंगलियों की हालत
फिर क्या हुवा जीवन का टर्निंग पॉइंट आया गांव मे गांय भैंस रखकर दूध बेचकर, कई किलोमीटर तक घास लाकर परेशानियों को कई वर्ष तक झेला, रिश्तेदारों के ताने सुनकर बहुत परेशान हो गया था परिवार, पढ़ाई, मेडिकल और अन्य चीजों की सुविधा ना होने के कारण वीरू की माताजी और पिताजी ने ठान लिया अब गांव मे नहीं रहना ज़ब वीरू 8 महीने का था अक्टूबर 1970 को हम सबको लेकर कई किलोमीटर पैदल चलकर गांव से सतपुली बाजार आयी वहा से गाड़ी मे देहरादून के धर्मपुर शहर मे रिश्ते मे बिष्ट परिवार के यहां एक गोशाला मे शरण ली..
बस वही से जीवन का संघर्ष सुरु हुवा गाए भैंस पाली दूध बेचा और अजबपुर कला देहरादून के प्राइमरी सरकारी स्कुल मे पढ़ाई सुरु की एक कमरे मे 8 बाई 8 फिट के कमरे मे माताजी पिताजी और चार भाई एक बहन ने पड़ना और मेहनत करना सुरु किया गरीबी मे जीवन व्यतीत किया लेकिन मेहनत पर भरोषा किया वीरू ज़ब 5 साल के थे उनके दादाजी स्वर्गीय शेर सिंह रावत जी ने उनको कहानिया सुनाई की वो फुटबाल खेले ज़ब ब्रिटिश गढ़वाल राइफल्स मे थे और बेहतरीन गोल कीपर थे कई बड़े टूर्नामेंट जीतते थे तो गांव कुलासु मे उनका ढ़ोल दमुऊ के साथ स्वागत किया जाता था बहुत नाम कमाया था,फिर पिताजी स्वर्गीय कैप्टेन श्री चंद्र सिंह रावत जी भी प्रथम गढ़वाल राइफल्स मे भर्ती हुवे थे और फुटबाल भी खेला करते थे पिताजी ने चाइना और पाकिस्तान की लड़ाई लड़ी थी
वीरू मट्टी वाले फर्स मे परिवार के साथ रहते थे सरकारी स्कुल के बाद वीरू छटवी ( 6) क्लास मे पड़ने के लिए चार भाइयो के साथ एक साईकिल मे देहरादून के श्री लक्समण विद्यालय इंटर कॉलेज मे पड़ने लगे फिर वही से फुटबाल का जूनून जागने लगा बड़ा भाई नेशनल फुटबाल खिलाडी कमल सिंह रावत को देखकर फुटबाल की सुरुवात की फिर 1986 मे अंडर 16 नेशनल फुटबाल खेला और हाई स्कुल ( 10वी ) पास की और फिर 12 वी क्लास देहरादून के डी ए वी इंटर कॉलेज से 12वी क्लास पास की और अंडर 19 फुटबाल नेशनल खेला लेकिन दुख हुवा दोनों नेशनल के सर्टिफिकेट उत्तरप्रदेश के सचिव ने हमारा सर्टिफिकेट किसी और को दे दिया यानी की बेच डाला
घर की माली स्थिति ठीक नहीं थी जंगल से लकड़ी लाना, गांय भैंस चराने जाना, दूध बेचना लगा रहा साथ ही साथ फुटबाल भी खेलते रहे बस जूनून था पड़ना खेलना और पेट पालने के लिए कुछ ना कुछ करना लेकिन किसी के आगे नहीं झुके मेहनत पर विश्वास किया 1998 मे 12वी पास की तो 50 रुपय मे बाल्मीकि के 5 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगा जिसमे पहले 50 रुपय मे 20 रुपय माताजी को दिए और 20 रुपय मे बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया धर्मपुर ब्रांच मे खाता खोला और 10 रुपय अपने खर्चे के लिए रखे उसके बाद ज़ब बी एस सी देहरादून के डी ए वी पी जी कॉलेज से कर रहा था तब देहरादून जोगीवाला के विवेकानंद स्कुल मे एक क्लर्क की 500 रुपय की नौकरी की जिसमे फीस लेना, टाइपिंग करना, बच्चों को फुटबाल खिलाना, पड़ना, किताबें बेचना यानि की सब काम किया बस एक ही मकसद था पड़ना, नौकरी करना, खेलना और उचित मुकाम पर पहुंचना बी एस सी भी चलती रही उसी दौरान डी ए वी पब्लिक स्कुल डिफेन्स कॉलोनी देहरादून मे एकाउंट्स क्लर्क की नौकरी मिल गईं 1200 रुपय मे मे, एम कोम किया, कंप्यूटर कोर्स किया, रेलवे इंजिनियरिंग की, दो बार सरकारी विभाग पी डब्लू डी और पोस्ट ऑफिस मे नौकरी लग गयी थी लेकिन घुस यानी पैसा माँगा गया वीरू के पास नहीं था तो सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, लेकिन निराश नहीं हुवा प्राइवेट नौकरी के साथ खेलना, पड़ना और नौकरी भी चलती रही कई बार जिला स्तर और आल इंडिया फुटबाल टूर्नामेंट मे घायल हुवा कभी छाती मे चोट, कभी दोनों हाथ सुन हो गए नौकरी भी छुटती गयी फिर द एशियन स्कुल देहरादून मे अकाउंटेंट की नौकरी 2000 की मिली उसके बाद, ओशो होटल मे नौकरी 2500 की की, सरदारी लाल ओबेरॉय बजाज स्कूटर की कंपनी देहरादून मे काम किया 2700 मे ,जी आर डी स्कुल मे 3000 की नौकरी मिली उसके बाद आर्यन स्कुल देहरादून मे 4500 मे की, उसके बाद द दून स्कुल मे एकाउंट्स की नौकरी की अनगिनत स्कुल मे अकॉउंट्स की नौकरी 24 साल की और कोचिंग भी चलती रही
लेकिन जूनून और पागलपन ने फुटबाल को नहीं छोड़ा पेट के लिए नौकरी भी की खेला भी और कई स्कुलो मे सुबह 7 बजे से रात 11 बजे तक एकाउंट्स का काम भी किया और फुटबाल भी खेलता रहा और फिर 1998 मे उत्तरप्रदेश फुटबाल एसोसिएशन मे रेफरी और कोच बना फुटबाल की सुरुवात देहरा यंग फुटबाल क्लब से 1980 मे सुरुवात की थी ज़ब 10 साल का था कई वर्ष खेलने के बाद क्लब भी चलाया, फिर इंदिरा फुटबाल क्लब चलाया खेला और कई स्टेट, आल इंडिया टूर्नामेंट जीते
1994 मे ज़ब अलग उत्तराखंड राज्य के लिए आंदोलन हुवा बढ़ चढ़कर भाग लिया लाठी डंडे गोली खायी मुजफ़रनगर कांड मे जहाँ 42 शहादत हुई थी हमारे सामने हमारे परम् मित्र रविंद्र सिंह रावत उर्फ़ पोलू ने वीरू के सामने ही दम तोड़ा था वीरू तीन दिन भूखे प्यासे गंन्नो के खेतो मे छुपते छुपाते घर पहुंचा
9 नंबर 2000 को अलग राज्य उत्तराखंड बना खुशी हुई उम्मीद जगी की बहुत कुछ अच्छा होगा
राज्य आंदोलनकारी बनकर राज्य के काम आए लेकिन हमने आज तक ना सरकारी नौकरी मांगी, ना पेंशन मांगी जो भी किया अपने बल बुते किया
अक्टूबर 1999 मे वीरू की शादी नार्मल परिवार की गीता से हो गयी फिर एक और जिम्मेदारी बढ़ गयी दो बेटियों का पिता बना, लेकिन हार नहीं मानी सब मैनेज़ किया,
क्लास वन रेफरी बना, नेशनल खिलाडी तो था ही फिर 2005 मे उत्तराखंड फुटबाल एसोसिएशन के साथ मिलकर 12 साल एक खिलाडी, कोच, रेफरी बनकर 13 जिलों मे भ्रमण किया टूर्नामेंट खेले और जीते, कोच बनकर टीम नेशनल स्तर पर लेकर जाने लगा,2005 मे संतोष ट्रॉफी टीम का कोच बना, जिला, स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर रेफ्रीशिप करने लगा, कई बार रेफरी करते हुवे खिलाड़ियों की मार भी झेलनी पड़ी, घायल भी हुवा, शोषण भी हुवा, नौकरी भीं चलती रही या नोकरी छोड़नी पड़ी फुटबाल के जूनून के लिए 2013 मे उत्तराखंड मे ज़ब आपदा आयी बीरु मुनस्यारी पिथौरागढ़ मे मैच खिलाने गया था 5 दिन लग गए घर वापस आते आते आपदा मे रास्ते बंद भूखे प्यासे घर जान बचाकर घर आया, 2014 मे कई वर्षो से फुटबाल के उचित विकास के लिए भारत सरकार की फीकी द्वारा एक मात्र उत्तराखंड से वीरू को फीफा के द्वारा आयोजित सौकोर सेमीनार मे मेंचेस्टर लंदन भेजा गया, सरकार की तरफ से कोई सहयोग नहीं हुवा 4 लाख का कर्ज ले लिया जो कई वर्षो तक झेलना पड़ा जबकि 2016 मे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा आश्वाशन दिया गया था की आर्थिक सहयोग होगा जो नहीं मिला, वीरू को खेल के छेत्र मे उचित काम करने पर भारत सरकार की सरकारी और गैर सरकारी विभाग और संस्था से स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल अवार्ड मिलते रहे समस्त उत्तराखंड मे वीरू 1998 से 2014 तक फेमस हो गया था लेकिन कुछ दुश्मनो को पसंद नही आया और वीरू की देहरादून फुटबाल एकेडमी जिसको वीरू ने 2011 मे स्थापित किया था 2015 मे स्पोंसर बनकर आए ठग ने कब्जा कर लिया और वीरू को जेल मे डाल दिया वीरू आत्महत्या कर रहा था वो तो धर्मपत्नी गीता रावत ने सहयोग किया बचाया और कहा हम सच्चे है जीतेंगे केश लड़ो फिर ढाई साल केश लड़ा और हाई कोर्ट से केश जीता क्लीन चिट मिल गयी पर ज़ब शोहरत मिलती है तो दुश्मन भी बहुत होते है लेकिन वीरू ने किसी का बुरा नहीं किया अपना काम करता रहा आगे बढ़ता रहा
वीरू ने खेल के लिए 2011 मे नौकरी छोड़ दी सारा फोकस खेल मे लगा दिया 1998 से कोचिंग खिलाड़ियों को तो दे ही रहा था निशुल्क, उत्तराखंड स्टेट फुटबाल एसोसिएशन के साथ 12 साल काम किया लेकिन स्टेट सचिव ने शोषण किया, रावत ने 2011 मे देहरादून फुटबाल एकेडमी और उत्तराखंड फुटबाल रेफरी एसोसिएशन बनाई काम किया नाम कमाया अवार्ड प्राप्त किया
रावत ने 2012 से लगातार आज भी आल इंडिया फुटबाल टूर्नामेंट, चेलेंज कप, उत्तराखंड आंदोलन कारी शहीद मेमोरियल टूर्नामेंट, आल इंडिया गढ़वाल कप, समर केम्प, विंटर केम्प हर वर्ष कराये और 2016 मे फेमस उत्तराखंड सुपर लीग जो इंडियन सुपर लीग की तर्ज पर किया, समाजिक कार्यकर्त्ता रहकर समाज के हित के अनेको काम किया, ब्लड दान किया
38वे नेशनल गेम्स उत्तराखंड मे आयोजित हुवे उसमे रावत को कोर्डिनेटर बनाया और मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित भी किया गया
रावत के द्वारा विभिन्न स्कुल और संस्थाओ मे जाकर युवाओं को प्रोत्साहित किया
वीरू के बनाये खिलाडी, कोच, रेफरी आज नेशनल, इंटरनेशनल स्तर पर नाम कमा रहे है जिसमे मुख्य अनिरुद्ध थापा, दिपेन्द्र सिंह नेगी, जितेंद्र सिंह बिष्ट, अनीता रावत, मोनिका बिष्ट, अंजलि नेगी, शिल्पा नेगी, राजा रावत, अमन जखमोला, प्रवीन रावत, अमित टमट्टा, वाजिद अली, अभिषेक रावत, राजेंद्र सिंह बेरोला, चर्चिल राणा, भास्कर तमंग आदि 27000 से अधिक अनगिनत खिलाड़ियों का उज्ज्वल भविष्य बनाया है जोआज ओ एन जी सी, एफ सी आई, ऑडिट, इनकम टेक्स, सेल टेक्स, गढ़वाल राइफल्स, कुमाऊ रेजिमेंट, गोरखा राइफल्स, सरकारी स्कुल, गैर सरकारी संस्था मे अपना जीवन यापन कर रहे वीरू का नाम हिंदुस्तान के समस्त राज्यों मे प्रशिद्ध है वीरू युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत है
जिसने जीवन भर संघर्ष किया खेल के लिए नौकरी छोड़ी, कर्ज लिया, जमीन बेचीं,जेल गया,शोषण सहा, और कई बार घायल हुवा लेकिन आज भी 57 साल की उम्र मे युवा जैसा जोश है अपनी फिटनेस के लिए वीरू नशे से दूर, फ़ास्ट फूड से दूर, मोबाइल से दूर रहते है और हमेशा सकारात्मक रह कर आगे बढ़ते है सुबह साढ़े चार बजे रोज उठते है कच्ची हल्दी का दूध, दो बासी रोटी खाते है और तेल मालिश करते है फिटनेस करते है और इवनिंग मे बच्चों को जो 5 साल से ऊपर और 70 साल तक के मास्टर्स खिलाड़ियों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करते है वीरू के सोशल मिडिया मे मिलियन चाहने वाले है जो उनकी गतिविधियों से प्रोत्साहित होते है
वीरू ने 5 साल मे 40 प्लस और 50 प्लस की नेशनल टीम मे खेलते हुवे उत्तराखंड को गोल्ड, सिल्वर, काँस्या पदक दिलाया है और हाल ही मे आबू दाबी दुबई मे इंटरनेशनल फुटबाल चैंपियनशिप मे खेलकर अपना जलवा दिखाया था
विरेन्द्र सिंह रावत को 2022 मे मुंबई की कॉमनवेल्थ वोकेशनल यूनिवर्सिटी से माननीय डॉ विरेन्द्र सिंह रावत की उपाधि ( पी एच डी ) से सम्मानित किया गया था
फेमस फ़िल्म डायरेक्टर करन जोहार की फ़िल्म स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2012 मे कोच का रोल किया था जिसमे फ़िल्म हीरो वरुण धवन और सिद्धार्थ मल्होत्रा को फुटबाल की कोचिंग दी थी वर्ष 2025 मे फ़िल्म एक्टर प्रवेश रावल की फ़िल्म पास्ट टेंस मे फुटबाल कोच का रोल किया था और एड फिल्मो मे रोल किया
रावत के जीवन पर शार्ट फ़िल्म बनी है और कई नेशनल और इंटरनेशनल अवार्ड मिल चुके है

डॉ रावत ने 24 साल विभिन्न स्कुल और संस्था मे अकाउंट का काम किया
डॉ रावत 27 साल से बच्चों को निशुल्क फुटबाल की कोचिंग देकर खिलाडी, कोच और रेफरी बना रहे है
रावत की इन उपलधियों को देखकर उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी और खेल मंत्री रेखा आर्य द्वारा समय समय पर सम्मानित भी किया है
वीरू का नाम भारत सरकार द्वारा पदम् श्री के लिए तीन बार नॉमिनी हुवा है
रावत 2022 मे चोबट्टाखाल विधानसभा से उत्तराखंड क्रांति दल से विधायक का चुनाव लड़ा था
वीरू का नाम और देहरादून फुटबाल एकेडमी का नाम कर्रेंट अफेयर्स मे अंकित हुवा है
वीरू को अभी तक 90 से ऊपर स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल अवार्ड से समस्त भारत और विदेशो से सम्मानित किया जा चूका है
वीरू ने समस्त युवाओं से अपील और निवेदन किया है की हार के बाद जीत है बस मेहनत करते रहो जो नसीब मे होगा वो जरूर मिलेगा एक दिन आपको
हमारा संघर्ष देखकर आपको निराश नहीं होना बस अंतिम सांस तक निर्भय होकर चलते रहो
असफलता एक चुनौती है इसे स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
ज़ब तक ना सफल हो नींद चेन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिस करने वालों की कभी हार नहीं होती8

 

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