HomeUncategorizedहरेला पर अनूप नौटियाल ने जतायी चिंता: 25 वर्षों में उत्तराखण्ड में...

हरेला पर अनूप नौटियाल ने जतायी चिंता: 25 वर्षों में उत्तराखण्ड में 46,203 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्जन, जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल की मांग

 

देहरादून:हरेला के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने एक वक्तव्य जारी कर उत्तराखण्ड में अतीत और वर्तमान में हो रहे व्यापक वन भूमि डायवर्जन पर गहरी चिंता व्यक्त की तथा राज्य में पर्यावरणीय रूप से जलवायु-अनुकूल विकास मॉडल अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की जारी कटाई आज उस विकास मॉडल का प्रतीक बन गई है, जो उत्तराखण्ड के जंगलों तथा संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार बढ़ता हुआ दबाव डाल रहा है। उन्होंने भारत सरकार एवं उत्तराखण्ड सरकार से ऐसे आधारभूत संरचना परियोजनाओं की समीक्षा करने तथा उन्हें निरस्त करने का आग्रह किया, जिनमें प्राकृतिक वनों का बड़े पैमाने पर और टाला जा सकने वाला विनाश शामिल हो।

हाल ही में प्राप्त सूचना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हरेला केवल हरियाली और वृक्षारोपण का पर्व नहीं है, बल्कि यह उत्तराखण्ड के जंगलों, नदियों, पर्वतों और प्राकृतिक संसाधनों के भविष्य पर गंभीर आत्ममंथन का अवसर भी है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत 16 जून 2026 को प्राप्त उत्तर के अनुसार, राज्य गठन (नवंबर 2000) के बाद से उत्तराखण्ड में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया गया है।

आरटीआई के अनुसार सड़क परियोजनाओं के लिए 10,070.03 हेक्टेयर (22%), खनन के लिए 9,289.81 हेक्टेयर (20%), ट्रांसमिशन लाइनों के लिए 3,005.51 हेक्टेयर (6.5%), विद्युत परियोजनाओं के लिए 2,250.08 हेक्टेयर (5%), सिंचाई परियोजनाओं के लिए 456.18 हेक्टेयर (1%), पेयजल परियोजनाओं के लिए 294.56 हेक्टेयर (0.5%), जबकि “अन्य” श्रेणी के अंतर्गत 20,837.63 हेक्टेयर (45%) वन भूमि का डायवर्जन किया गया है। उन्होंने कहा कि “अन्य” श्रेणी के अंतर्गत इतनी बड़ी मात्रा में वन भूमि का डायवर्जन होना अधिक पारदर्शिता तथा सार्वजनिक जानकारी की आवश्यकता को दर्शाता है।

अनूप नौटियाल ने जिला-वार आंकड़ों पर विशेष चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले 25 वर्षों में उत्तराखण्ड में हुए कुल वन भूमि डायवर्जन का लगभग 47 प्रतिशत अर्थात 21,618.32 हेक्टेयर केवल देहरादून जिले में हुआ है। इसके बाद हरिद्वार में 6,002.32 हेक्टेयर (13%), नैनीताल में 3,603.83 हेक्टेयर (8%), चमोली में 3,065.34 हेक्टेयर (6.5%) तथा टिहरी गढ़वाल में 2,555.29 हेक्टेयर (5.5%) वन भूमि का डायवर्जन हुआ है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या आने वाले वर्षों में भी राज्य के लगभग आधे वन भूमि डायवर्जन का बोझ अकेले देहरादून पर ही पड़ता रहेगा? उन्होंने कहा कि दून घाटी तथा इसके आसपास के शिवालिक क्षेत्र की वहन क्षमता को असीमित नहीं माना जा सकता।

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब उत्तराखण्ड जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। राज्य में अतिवृष्टि, फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, वनाग्नि, मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि अवैज्ञानिक एवं असंतुलित विकास का सबसे अधिक दुष्प्रभाव समाज के आर्थिक रूप से कमजोर एवं हाशिये पर रहने वाले वर्गों पर पड़ता है, जिनके पास आपदाओं से उबरने के लिए सबसे कम संसाधन उपलब्ध होते हैं।

अनूप नौटियाल ने कहा कि यह बहस विकास बनाम पर्यावरण की नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के लिए ऐसे विकास मॉडल की है जो आर्थिक प्रगति और पारिस्थितिक सुरक्षा​, दोनों को समान महत्व दे। उन्होंने पर्यटन, चारधाम यात्रा एवं शहरी विकास के लिए वैज्ञानिक कैरिंग कैपेसिटी आधारित नियमन, सभी आधारभूत ​इंफ़्रा परियोजनाओं में पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव संबंधी कानूनों का पूर्ण अनुपालन, बड़ी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, बेहतर क्षेत्रीय एवं शहरी नियोजन, जहां आवश्यक हो वहां ईको-सेंसिटिव जोन अधिसूचित किए जाने तथा प्राकृतिक वनों, नदियों और जैव विविधता के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन में अधिक निवेश करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि आरटीआई के उत्तर में वन भूमि डायवर्जन का विस्तृत विवरण उपलब्ध कराया गया है, लेकिन प्रतिपूरक वनीकरण से संबंधित मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। उन्होंने कहा कि जब हजारों हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जा रहा है, तब नागरिकों को यह जानने का अधिकार है कि प्रतिपूरक वनीकरण कहां होगा, कब होगा, किस प्रकार होगा तथा उसकी निगरानी और सफलता सुनिश्चित करने की क्या व्यवस्था होगी। उन्होंने कहा कि हिमालय के परिपक्व प्राकृतिक वनों की भरपाई केवल पौधारोपण अभियानों से नहीं की जा सकती तथा मौजूदा प्राकृतिक वनों का संरक्षण ही जलवायु परिवर्तन के इस दौर में उत्तराखण्ड की सबसे प्रभावी सुरक्षा रणनीति है।

अपने वक्तव्य के अंत में अनूप नौटियाल ने प्रदेशवासियों को हरेला पर्व की शुभकामनाएं देते हुए आशा व्यक्त की कि यह पर्व सरकार, संस्थानों और नागरिकों को उत्तराखण्ड के जल, जंगल और ज़मीन के संरक्षण के प्रति अपने सामूहिक संकल्प को और मजबूत करने के लिए प्रेरित करेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित, सतत उत्तराखण्ड विरासत में मिल सके।

धन्यवाद एवं हरेला पर्व की पुन: हार्दिक शुभकामनाएं।

अनूप नौटियाल
देहरादून, उत्तराखण्ड
16 जुलाई, 2026

Static 1 Static 1
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

STAY CONNECTED

123FansLike
234FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest News