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अमित शाह की लोकतंत्र बचाओ यात्रा पर कांग्रेस का सवाल: गरिमा बोलीं- पहले उत्तराखंड को दिए वादों का दें हिसाब 

लोकतंत्र की हत्या करने वाले आज निकाल रहे लोकतंत्र बचाओ यात्रा: गरिमा दसौनी

लोकतंत्र बचाने निकले अमित शाह, पहले 2016 में उत्तराखंड की सरकार गिराने का जवाब दें: दसौनी

**2016 में उत्तराखंड की जनता द्वारा चुनी गई हरीश रावत सरकार को गिराने की साजिश से लेकर दूसरे राज्यों में सरकारों को अस्थिर करने तक, अमित शाह की भूमिका पर उठते रहे हैं सवाल।**

**धनतेरस के दिन गृहमंत्री के कार्यक्रम से आम जनता, व्यापारियों और श्रद्धालुओं को होने वाली असुविधा के लिए कौन जिम्मेदार होगा?**

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के 6 नवंबर को देहरादून आगमन और परेड ग्राउंड से प्रस्तावित लोकतंत्र बचाओ यात्रा पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोकतंत्र की हत्या करने वाले आज लोकतंत्र बचाने की बात कर रहे हैं। आखिर अमित शाह किससे लोकतंत्र बचाने निकले हैं? क्या देश की जनता को यह बताने की जरूरत नहीं है कि लोकतंत्र के नाम पर सबसे बड़ा राजनीतिक प्रहार किसने किया?

दसौनी ने कहा कि वर्ष 2016 में उत्तराखंड में हरीश रावत के नेतृत्व वाली जनता द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को गिराने के लिए जिस तरह राजनीतिक जोड़तोड़, विधायकों की खरीद-फरोख्त और दलबदल को बढ़ावा दिया गया, वह देश के लोकतांत्रिक इतिहास का एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है। कांग्रेस का आरोप रहा है कि तत्कालीन केंद्र की भाजपा सरकार ने उत्तराखंड की निर्वाचित सरकार को अस्थिर करने का सुनियोजित प्रयास किया। इसके बाद भी विभिन्न राज्यों में निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने और दलबदल के जरिए सत्ता हासिल करने की घटनाएं सामने आती रहीं। इन राजनीतिक घटनाक्रमों में अमित शाह की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में उन्हीं के नेतृत्व में लोकतंत्र बचाओ यात्रा निकालना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक विरोधाभास है।

दसौनी ने कहा कि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट 25 हजार लोगों के पदयात्रा में शामिल होने का दावा कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या भीड़ जुटा लेने से लोकतंत्र बच जाता है? लोकतंत्र बचाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता, जनता के जनादेश का सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा जरूरी है।

मुख्य प्रवक्ता ने अमित शाह के कार्यक्रम की तारीख पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि 6 नवंबर को धनतेरस का पावन पर्व है। सनातन धर्म में धनतेरस का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस दिन लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना, चांदी, बर्तन अथवा अन्य धातुएं खरीदते हैं और उन्हें मंदिर में रखकर पूजा-अर्चना करते हैं। बाजारों में खरीदारी के लिए भारी भीड़ उमड़ती है। ऐसे महत्वपूर्ण पर्व पर शहर के बीचोंबीच बड़े राजनीतिक आयोजन और पदयात्रा से यातायात बाधित होने, बाजारों तक लोगों की पहुंच प्रभावित होने और व्यापारियों के कारोबार को नुकसान पहुंचने की आशंका है। सवाल यह है कि क्या भाजपा को आम जनता, व्यापारियों और श्रद्धालुओं की सुविधा का कोई ध्यान नहीं है? क्या सनातन परंपराओं का सम्मान केवल भाषणों तक सीमित है?

दसौनी ने कहा कि पिछले 13 वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मन की बात सुनते-सुनते देश की जनता अब उनके वादों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर देख रही है। उत्तराखंड की जनता ने भाजपा को भरपूर समर्थन दिया। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उत्तराखंड को डबल इंजन की सरकार का भरोसा दिया और जनता ने एक नहीं, बल्कि दो-दो बार भाजपा को प्रचंड बहुमत की सरकार सौंपी। पांचों लोकसभा सीटें लगातार भाजपा की झोली में डालीं। इसके बावजूद उत्तराखंड के हिस्से में आखिर आया क्या?

उन्होंने कहा कि कभी प्रधानमंत्री ने कहा कि मां गंगा ने उन्हें बुलाया है, कभी बाबा केदार का आह्वान बताया, कभी उत्तराखंड से अपने पुराने रिश्ते की बात की और कभी प्रदेश को देश का नंबर वन राज्य बनाने का सपना दिखाया। लेकिन इन तमाम दावों और वादों का परिणाम प्रदेश की जनता आज भी तलाश रही है।

दसौनी ने कहा कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में उत्तराखंड में महिला अपराध, बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था से जुड़े गंभीर सवाल लगातार उठते रहे हैं। जिस प्रदेश को देश का नंबर वन राज्य बनाने का वादा किया गया था, वहां महिलाओं की सुरक्षा को लेकर जनता चिंतित है। भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं ने युवाओं के भविष्य और व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। चंदा चोरी से लेकर सोना चोरी तक के आरोपों और विवादों ने सरकार की जवाबदेही को कठघरे में खड़ा किया है।

उन्होंने कहा कि अंकिता भंडारी प्रकरण में आज भी परिवार और प्रदेश की जनता न्याय की मांग कर रही है। इस मामले में उठ रहे सवालों का संतोषजनक जवाब और न्याय की दिशा में ठोस कार्रवाई जनता की अपेक्षा है। विडंबना यह है कि उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी का नाम प्रदेश के महत्वपूर्ण राजनीतिक मंचों से भी अपेक्षित प्रमुखता के साथ नहीं उठाया जाता।

दसौनी ने कहा कि उत्तराखंड आपदाओं की दृष्टि से बेहद संवेदनशील राज्य है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोग आज भी समुचित मुआवजे, पुनर्वास और स्थायी समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। प्रदेश को न तो अपेक्षित ग्रीन बोनस मिला, न विशेष औद्योगिक पैकेज और न ही विशेष राज्य के दर्जे की बहाली हुई। इन महत्वपूर्ण मांगों पर केंद्र सरकार की ओर से कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता जानना चाहती है कि डबल इंजन की सरकार और केंद्र में मजबूत बहुमत होने के बावजूद प्रदेश के युवाओं, महिलाओं, किसानों, व्यापारियों, आपदा प्रभावितों और आम नागरिकों को उनके अधिकार और सुविधाएं क्यों नहीं मिल पाईं?

दसौनी ने अंत में कहा कि अमित शाह को लोकतंत्र बचाओ यात्रा निकालने से पहले उत्तराखंड की जनता को यह बताना चाहिए कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए उन्होंने अब तक क्या किया और उत्तराखंड को दिए गए वादों का हिसाब कब देंगे। लोकतंत्र केवल नारों, यात्राओं और भीड़ से नहीं बचता, बल्कि जनता के जनादेश, संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों का सम्मान करने से बचता है। उत्तराखंड की जनता अब नारों से नहीं, अपने सवालों के जवाब और सरकार के कामकाज का हिसाब चाहती है।

गरिमा मेहरा दसौनी

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