
गुरुवार को PIL No. 100 of 2026 की प्रति सरकार को उसके अधिवक्ता के माध्यम से प्राप्त हुई। माननीय उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई सोमवार की सुबह निर्धारित कर दी।
और फिर, शुक्रवार को—अर्थात् सुनवाई से ठीक पहले—तीन PWD इंजीनियरों को निलम्बित कर दिया गया। इतना ही नहीं, यह दिखाने के लिए कि सरकार इस गंभीर मामले पर सक्रियता से काम कर रही है, सम्बन्धित ठेकेदार को आगे कोई कार्य न दिए जाने के आदेश भी जारी कर दिए गए।
आखिरकार, सरकार माननीय न्यायालय के समक्ष खाली हाथ तो नहीं जा सकती थी।
लेकिन आश्चर्य यह है कि इस पूरे घटनाक्रम की चर्चा मीडिया में लगभग नदारद है। किसी ने यह सवाल पूछने की जरूरत भी नहीं समझी कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सरकार, जो इतने समय से इस गंभीर समस्या पर निष्क्रिय दिखाई दे रही थी, अचानक इतनी सक्रिय हो गई?
क्या यह महज सरकारी सक्रियता थी? या फिर PIL No. 100 of 2026 ने उस व्यवस्था को जगाने का काम किया, जो लंबे समय से सोई हुई थी?
लोकतंत्र में न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं है। कई बार न्यायिक हस्तक्षेप ही प्रशासन को उसकी संवैधानिक और सार्वजनिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है।
मुद्दा किसी व्यक्ति को श्रेय देने का नहीं है। मुद्दा यह पूछने का है कि यदि PIL के बाद कार्रवाई सम्भव थी, तो उससे पहले क्यों नहीं हुई?
जनता को इस सवाल का जवाब मिलना चाहिए।
PIL में निम्नलिखित आठ लीगल इश्यूज उठाए गए हैं:
1. क्या जनता के पैसे से दोबारा बनाया गया एक सार्वजनिक पुल बार-बार टूटना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को प्राप्त जीवन और सुरक्षा के अधिकार का उल्लंघन है?
2. क्या सरकारी विभाग यह सुनिश्चित किए बिना कि पुल या अन्य सार्वजनिक निर्माण सभी आवश्यक तकनीकी और सुरक्षा मानकों पर खरा उतरता है, उसे जनता के उपयोग के लिए खोल सकते हैं या उसकी अनुमति दे सकते हैं?
3. क्या पुल की मजबूती और सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना उस पर भारी मात्रा में सरकारी धन खर्च करना मनमाना कार्य है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है?
4. क्या राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह जनता के धन से बने पुलों या अन्य सार्वजनिक निर्माणों के बार-बार विफल होने की स्थिति में पूरी पारदर्शिता, जवाबदेही और वैज्ञानिक जांच सुनिश्चित करे?
5. क्या इस माननीय न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने विशेष अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुल के टूटने के वास्तविक कारणों की स्वतंत्र विशेषज्ञों से जांच कराने का आदेश देना चाहिए?
6. क्या पुल से जुड़ी सड़क (एप्रोच रोड) के ध्वस्त होने वाले स्थान को सुरक्षित रखे बिना उसकी मरम्मत या पुनर्निर्माण शुरू कर देना, उस घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण साक्ष्यों को मिटाने या छिपाने के बराबर है?
7. क्या जनहित में ऐसे अन्य पुलों की भी स्वतंत्र तकनीकी और सुरक्षा जांच कराई जानी चाहिए, जिनकी स्थिति या निर्माण इसी प्रकार का है?
8. क्या भारतीय जनता पार्टी प्रदेश महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष की फर्म को यह व्यावसायिक ठेका दिया जाना हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मामला है?
