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सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टरों के लिए सख्ती: पहाड़ों में सेवा नहीं तो PG पर लगेगी रोक

बॉन्ड तोड़ा तो अब नहीं बचेगी राह! दूरस्थ क्षेत्रों में 3 साल सेवा अनिवार्य करने जा रही सरकार

200 डॉक्टरों पर रिकवरी की मार, अब पहाड़ों में सेवा से बचना पड़ेगा भारी

सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़े डॉक्टरों को दूरस्थ क्षेत्रों में तीन साल सेवा अनिवार्य:  कैबिनेट में विधेयक लाने की तैयारी

देहरादून। उत्तराखंड के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से सस्ती दरों पर एमबीबीएस और पीजी की पढ़ाई करने के बाद बॉन्ड तोड़कर पहाड़ी क्षेत्रों में सेवा देने से बचने वाले डॉक्टरों पर सरकार अब सख्त कार्रवाई की तैयारी में है। कैबिनेट में ऐसा विधेयक लाया जा रहा है, जिसके तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पढ़े डॉक्टरों को दूरस्थ क्षेत्रों में कम से कम तीन साल सेवा देनी होगी। इसके बाद ही उन्हें पीजी कोर्स के लिए सरकार की एनओसी जारी की जाएगी।
पिछले तीन वर्षों में बॉन्ड तोड़ने वाले करीब 200 डॉक्टरों के खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) जारी की जा चुकी हैं। पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों की भारी कमी के बीच बॉन्ड तोड़कर गायब होने वाले डॉक्टर सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।
अकेले राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी से बॉन्ड भरने वाले 69 डॉक्टरों के खिलाफ आरसी जारी की गई है। इनमें 41 एमबीबीएस और 28 पीजी/विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं। कॉलेज अब इनके खिलाफ कानूनी नोटिस भेजने की भी तैयारी कर रहा है।
बॉन्ड की शर्त के अनुसार सरकारी मेडिकल कॉलेजों से कम शुल्क पर पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को तीन से पांच वर्ष तक सरकारी अस्पतालों में सेवा देनी होती है। सेवा नहीं देने पर बॉन्ड की निर्धारित राशि जमा करनी होती है। लेकिन बड़ी संख्या में डॉक्टरों ने न तो सेवा दी और न ही बॉन्ड राशि जमा की, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुई हैं।
स्वास्थ्य महानिदेशक के निर्देश पर तहसीलदारों के माध्यम से रिकवरी की कार्रवाई शुरू की गई। इसका असर भी दिखा। कार्रवाई के बाद 20 डॉक्टरों ने, जिनमें 7 एमबीबीएस और 13 पीजी डॉक्टर शामिल हैं, करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये की बॉन्ड राशि जमा कर दी। लेकिन 49 डॉक्टर अब भी न तो राशि जमा कर रहे हैं और न ही कोई जवाब दे रहे हैं।
इनमें 45 डॉक्टरों की ओर से कोई जवाब नहीं मिला, जबकि 4 डॉक्टर अपने स्थायी पते पर भी नहीं मिले। इनमें डॉ. नमिता वासीकोटी (पिथौरागढ़), डॉ. अनिका कुमारी (बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश), डॉ. सबरीन नाज (देहरादून) और डॉ. तेजेन पेलडेन (देहरादून) शामिल हैं।

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