कहीं विशेषज्ञों के पद खाली, कहीं तैनाती पर सवाल: RTI ने खोली स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था की परतें
मैदानों में तैनाती की मांग, पहाड़ में विशेषज्ञों का इंतजार; RTI के दस्तावेजों से उठे सवाल
जब हमारे पहाड़ में कोई गरीब बीमार पड़ता है या किसी गर्भवती बहन को रात में दर्द उठता है, तो अस्पताल जाने पर एक ही जवाब मिलता है— “यहाँ बड़ा डॉक्टर (स्पेशलिस्ट) नहीं है, हल्द्वानी या देहरादून ले जाओ!”
आखिर पहाड़ के अस्पतालों में डॉक्टर क्यों नहीं आते? यह जानने के लिए मैंने देहरादून स्वास्थ्य महानिदेशालय में सूचना का अधिकार (RTI रजिस्ट्रेशन संख्या: DGMHF/R/2026/60132) लगाया। विभाग ने जवाब में मुझे 110 पन्नों की सरकारी फाइल और नोटशीट (पत्रांक: 26594, दिनांक 10 जुलाई 2026) दी है।
इन सरकारी कागजों को पढ़कर आपका भी खून खौल उठेगा। देखिए, हमारे टैक्स के पैसे से मोटी तनख्वाह और सरकारी खर्च पर बड़ी डिग्री (PG) लेने वाले डॉक्टर पहाड़ चढ़ने से बचने के लिए सरकारी फाइलों में कैसे-कैसे बहाने और जुगाड़ लगा रहे हैं:
1. पहाड़ न जाने के अजीबोगरीब बहाने और VIP सिफारिशें:
सरकारी फाइल नोटिंग के मुताबिक, जब डॉक्टरों को विशेषज्ञ बनाकर पहाड़ भेजने की बारी आई, तो अर्जियों की लाइन लग गई:
किसी डॉक्टर ने लिखा— “मेरी शादी देहरादून में हुई है, इसलिए मुझे देहरादून में ही रखा जाए।”
किसी ने बागेश्वर से हटने के लिए लिखा— “मेरे दादा-दादी को दिल की बीमारी है, मुझे देहरादून या हरिद्वार के पास भेजा जाए।”
किसी की माताजी ने सीधे सचिव को चिट्ठी लिख दी कि मेरी बेटी को सिर्फ हरिद्वार, रुड़की या देहरादून के अस्पतालों में ही तैनाती दी जाए।
कई डॉक्टरों ने मंत्रियों, बड़े अफसरों और नेताओं से सिफारिश लगवाकर पौड़ी, चमोली, अल्मोड़ा और उत्तरकाशी के पहाड़ी अस्पतालों के बजाय देहरादून, मसूरी, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुड़की और उधमसिंहनगर जैसे मैदानी शहरों में अपनी पोस्टिंग करवा ली!
2. जो डॉक्टर परीक्षा में ‘फेल’ हुए, उन्हें पहाड़ भेज दिया!
सबसे चौंकाने वाली बात सरकारी नोटशीट के पन्ना नंबर 45 से 57 और आदेश दिनांक 17 मार्च 2026 में दर्ज है। जिन डॉक्टरों ने अपनी डॉक्टरी की बड़ी परीक्षा (PG Exam) पास ही नहीं की—जिनके नाम के आगे खुद विभाग ने फाइल में ‘अनुत्तीर्ण (Fail)’ या ‘Exam Not Clear’ लिखा है—उन्हें पिथौरागढ़, पौड़ी और उत्तरकाशी जैसे पहाड़ी जिलों के अस्पतालों में ‘विशेषज्ञ’ बनाकर भेज दिया गया! इतना ही नहीं, 18 से ज्यादा ऐसे डॉक्टरों की तैनाती कर दी गई जिनका उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल में विशेषज्ञ के तौर पर रजिस्ट्रेशन तक जमा नहीं था।
सवाल यह है कि क्या पहाड़ के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है? पास और रसूखदार डॉक्टर मैदान में, और बिना रजिस्ट्रेशन या फेल हुए डॉक्टर पहाड़ में?
3. पिथौरागढ़ में त्राहिमाम, पर देहरादून में बैठे अफसर खामोश!
इसी फाइल में पिथौरागढ़ महिला अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक की 19 जनवरी 2026 की चिट्ठी लगी है, जिसमें उन्होंने हाथ जोड़कर लिखा है कि फरवरी के बाद अस्पताल में डिलीवरी और ऑपरेशन (सिजेरियन) करने के लिए एक भी महिला डॉक्टर (गायनेकोलॉजिस्ट) नहीं बचेगी। डीडीहाट और गंगोलीहाट के सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 100% पद खाली पड़े हैं। डीडीहाट में एक डेंटल डॉक्टर की तैनाती हुई भी, तो वह ड्यूटी पर ही नहीं आईं और विभाग को उनके घर के पते पर चिट्ठी भेजनी पड़ी!
साथियों, अब चुप रहने का समय नहीं है!
अस्पताल में डॉक्टर, दवाई और इलाज मिलना कोई भीख नहीं, बल्कि संविधान से मिला हमारा ‘जीने का अधिकार’ है। जब हम वोट देते हैं और हर चीज पर टैक्स भरते हैं, तो हमारे बच्चों और बुजुर्गों को इलाज के बिना दम क्यों तोड़ना पड़े?
एक जागरूक नागरिक बनिए और आवाज उठाइए:
इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि हर गांव और हर व्यक्ति तक यह सच पहुंचे।
अपने विधायक, सांसद और जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछिए कि जब डॉक्टर सिफारिश लगाकर मैदान भाग रहे हैं, तब वे चुप क्यों हैं?
CM Helpline 1905 पर फोन करके अपने क्षेत्र के अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती की मांग दर्ज कराएं।
जब तक हम खुद अपने हक के लिए बोलना शुरू नहीं करेंगे, तब तक देहरादून की फाइलों में हमारे पहाड़ के साथ यही खिलवाड़ होता रहेगा।
(नोट: इस पोस्ट में लिखी गई एक-एक बात स्वास्थ्य महानिदेशालय, देहरादून द्वारा आरटीआई संख्या DGMHF/R/2026/60132 के तहत दिए गए 110 पन्नों के प्रमाणित सरकारी रिकॉर्ड पर आधारित है।)
किशोर ह्यूमन

