उत्तराखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग जन्म से ट्रांसजेंडर एंव ट्रांसजेंडर पहचान के साथ रह रहे बच्चों को मुख्यधारा में समावेशन हेतु डा० गीता खन्ना, मा० अध्यक्ष
देहरादून/कोटद्वार।उत्तराखंड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा दिनांक 27.01.2026 को जन्म से ट्रांसजेंडर एंव ट्रांसजेंडर पहचान के साथ रह रहे बच्चों को मुख्यधारा में समावेशन हेतु डा० गीता खन्ना, मा० अध्यक्ष महोदया की अध्यक्षता में आई०सी०डी०एस० सभागार में बैठक आयोजित की गई। बैठक का उद्देश्य ट्रांसजेंडर बच्चों के संरक्षण, समावेशन एवं समग्र विकास में आ रही चुनौतियों हेतु सम्बन्धित विभागों के मध्य समन्वित रणनीति, नीतियों एवं कार्य प्रणालियों पर विचार विमर्श करने के सम्बन्ध में समाज सेवी संस्थान, बाल कल्याण समिति, जिला बाल संरक्षण इकाई, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, महिला कल्याण विभाग, गृह विभाग / पुलिस, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण एवं ट्रांसजेंडर प्रतिनिधि को बैठक में आमंत्रित किया गया था।कार्यकम में डा० शिव कुमार बरनवाल, सचिव, उत्तराखण्ड बाल अधिकार संरक्षण आयोग, डा० सतीश कुमार सिंह, अनुसचिव, उत्तराखण्ड बाल अधिकार संरक्षण आयोग, श्रीमती नमिता ममगाई, अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति, श्रीमती हेमलता पाण्डेय, उप निदेशक, समाज कल्याण विभाग, श्री नितिश भदोला, लिगल ऐड डिफेंस काउंसिल, डालसा, देहरादून, ट्रांसजेंडर प्रतिनिधि ओशीन, वॉयस आफ वॉरियर फाउडेशन व अदिति, सेतु संस्था फाउडेशन, आदि उपस्थित रहें। एम्स ऋषिकेश से डा० सत्यावरी, डा० प्रज्ञा, एण्डोक्राईनोलॅजिस्ट, व डा० इनोनो योशु, बाल रोग विशेषज्ञ ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।
बैठक में मा० अध्यक्ष महोदया द्वारा कहा गया कि जन्म से ट्रांसजेंडर एंव ट्रांसजेंडर पहचान के साथ रह रहे बच्चों को समाज की बहुत सी कुरितियां/ तंज का सामना करना पडता है। किन्तु हमें निर्धारित करना होगा कि ऐसे बच्चों को जो जन्म से ही मानसिक यातना से जूझ रहे है, उन्हें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधायें, सुरक्षित परिवेश तथा अर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सके। वर्तमान में राज्य में ट्रांसजेंडर बच्चों को लेकर उनके पहचान एवं दस्तावेजीकरण, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की आसान पहुंच, पारिवारिक अस्वीकार्यता, परित्याग एंव संस्थागत देखभाल, सामाजिक भेदभाव, उत्पीडन एवं हिंसा एक महत्वपूर्ण चुनौती है।ट्रांसजेंडर समाज के उपस्थित प्रतिनिधि ओशीन व अदिति द्वारा अवगत कराया गया कि उनके समक्ष समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य व परिवारिक समावेश मिल पाना एक अहम चुनौती है। उनका अपने, समाज में गुरू चेले का माहौल मिलता है, किन्तु सामाजिक परिवेश के लोग उन्हें वह सम्मान नहीं प्राप्त हो पा रहा है, जिसके वे अधिकारी है। यहां तक कि सरकार की ओर से वर्ष 2019 में ट्रांसजेंडर अधिनियम आ जाने के बावजूद भी शिक्षण संस्थानों में आईडी कार्ड में ट्रांसजेंडर का विकल्प उपलब्ध नही है, उन्हें महिला/पुरुष में ही नामांकन करने को विवश किया जाता है। उनके द्वारा अवगत कराया गया कि समाज में रहने हेतु आम तौर पर बनने वाले पहचान पत्र आदि बनाने में भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।समाज कल्याण विभाग द्वारा अवगत कराया गया कि प्रदेश में ट्रांसजेंडरों का पहचान पत्र आदि बनाने में ट्रांसजेंडर की ओर से भी दिक्कत आती है। सभी ट्रांसजेंडर अपनी पहचान
समाज के सामने खोलने में हिचकिचाते है। प्रदेश में लगभग 1000 ट्रांसजेंडर होगें जिसमें से केवल 76 का नामांकन करते हुये प्रमाणित किये जाने की कार्यवाही पिछले छः वर्षों में हो पायी है, जो कि औसत से काफी कम है। ट्रांसजेण्डर समुदाय को सरकार के विभिन्न योजनाओं का लाभ प्राप्त करने हेतु स्वयं भी रजिस्टर कराने की अपेक्षा की गई, जिसके लिये पारिवारिक व व्यक्तिगत परामर्श / काउन्सलिंग की आवश्यकता है। समाज कल्याण विभाग के द्वारा यह भी बताया गया कि ट्रांसजेंडर बच्चों हेतु 09वीं व 10वीं कक्षा हेतु रू 13500/- प्रतिवर्ष छात्रवृति दी जा रही है, किन्तु आजतक किसी ने भी इसका लाभ नहीं लिया है।बाल कल्याण समिति द्वारा अवगत कराया गया कि ट्रांसजेंडर व्यस्कों के लिये अन्य राज्यों में गरिमा गृह बनाये गये है, किन्तु उत्तराखण्ड राज्य मे ट्रांसजेण्डर बच्चों के लिये कोई उपयुक्त स्थान / गृह उपलब्ध नहीं है। मा० अध्यक्ष के द्वारा निर्देशित किया गया कि बाल विकास विभाग व समाज कल्याण विभाग, बाल कल्याण समिति की देखरेख में फिट फैसिलिटि का निर्माण करें, दुर्भाग्यवश राज्य में वयस्कों हेतु भी गरिमा गृह नहीं है।
एम्स, ऋषिकेश से डाक्टरों के द्वारा जानकारी दी गयी कि एम्स में ट्रांसजेण्डर, बच्चों / अभिभावकों की काउन्सलिंग के साथ-साथ हार्मोन थैरेपी व सर्जरी की जा रही है। संस्था के द्वारा ट्रांसजेण्डर प्रतिनिधियों के साथ समन्वय करते हुए पृथक ट्रांसजेण्डर क्लीनिक भी स्थापित किया जा रहा है, जो कि एक सराहनीय प्रयास है।
शिक्षा विभाग द्वारा अवगत कराया गया कि यू-डाईस पोर्टल में केवल 03 ट्रांसजेंडर बच्चे ही नामांकित हुये है। समाज में जानकारी का अभाव होने के कारण विद्यालयों के यू-डाईस पोर्टल पर नामांकन नहीं किया जा रहा है व परिजन व सामाजिक व्यवस्था इस सम्बन्ध में ट्रांसजेण्डर बच्चों के हित में अभी भी असंवेदनशील बना हुआ है।DLSA के लिगल ऐड डिफेंस काउंसिल द्वारा अवगत कराया गया कि वर्ष 2014 में नालसा वर्सिज यूनियन ऑफ इण्डिया में मा० उच्चतम न्यायालय की रूलिंग में थर्ड जेंडर को मूल अधिकार में सम्मिलित किया गया था तथा वर्ष 2019 में जब Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019 लागू किया गया था, जिसमें ट्रांसजेंडर को परिभाषित किया गया है तथा उनके अधिकारों को संरक्षित किया गया है। परन्तु इसके प्रचार-प्रसार / जागरूकता की कमी है। जबकि उडीसा व आंध्रप्रदेश में ट्रांसजेंडर बच्चों में पारिवारिक समावेश हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जिससे उनका पारिवारिक तंत्र में ही संरक्षित जीवन यापन की सुविधा मिल रही है जो कि मुख्यधारा में ट्रांसजेंडर बच्चों के संवेदीकरण वातावरण हेतु अतिउत्तम हो रहा है। जिसे उत्तराखण्ड में भी लागू किया जाना आवश्यक है।मा० अध्यक्ष महोदया द्वारा बैठक में सभी विभागों को सुनने के पश्चात महिला सशक्तिकरण एंव बाल विकास विभाग से समन्वय स्थापित करते हुये ट्रांसजेंडर बच्चों हेतु दिशा-निर्देश तैयार किये जाने हेतु उच्च स्तरीय बैठक आयोजित किये जाने हेतु कहा गया।
