संसद में महिला आरक्षण विधेयक का गिरना दुर्भाग्यपूर्ण जरूर है, लेकिन यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कांग्रेस सहित विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकार की भ्रामक और असंवैधानिक मंशा के खिलाफ मतदान किया।
कांग्रेस पार्टी शुरू से महिला आरक्षण की प्रबल समर्थक रही है। हमारा स्पष्ट मत रहा है कि महिलाओं को बिना किसी शर्त और बिना किसी देरी के तत्काल आरक्षण दिया जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने इस अधिकार को परिसीमन और जनगणना जैसी अनिश्चित और लंबी प्रक्रियाओं से जोड़कर इसे लागू करने के बजाय टालने का रास्ता चुना।
यह विधेयक महिलाओं को अधिकार देने का नहीं, बल्कि राजनीतिक गणित साधने का माध्यम बन गया था। इसके जरिए केंद्र सरकार संविधान के महत्वपूर्ण प्रावधानों में बदलाव कर परिसीमन की प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में लेना चाहती थी, जिससे संघीय ढांचे पर गंभीर प्रभाव पड़ता और राज्यों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा होता।
हमारा विरोध महिला आरक्षण का नहीं, बल्कि इस बात का है कि महिलाओं के हक को एक राजनीतिक औजार बनाकर देश के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की कोशिश की जा रही थी।
कांग्रेस का मानना है कि:
– महिला आरक्षण तुरंत लागू होना चाहिए, न कि किसी भविष्य की प्रक्रिया पर निर्भर।
– इसमें OBC महिलाओं के लिए भी स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए।
– परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर व्यापक चर्चा और सर्वदलीय सहमति जरूरी है।
– जनगणना और सामाजिक न्याय के वास्तविक आंकड़ों को नजरअंदाज कर कोई भी निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए।
आज का दिन यह दिखाता है कि सरकार महिलाओं के नाम पर राजनीति कर रही है, जबकि कांग्रेस महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है।
हम देश की आधी आबादी को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि कांग्रेस उनके अधिकारों के लिए हर स्तर पर संघर्ष करती रहेगी और किसी भी परिस्थिति में उनके हक को राजनीतिक सौदेबाज़ी का हिस्सा नहीं बनने देगी।
— गरिमा मेहरा दसौनी
प्रवक्ता, उत्तराखंड कांग्रेस
