जागर से डिजिटल दुनिया तक: उत्तराखंड की भाषाओं को वैश्विक मंच देने की तैयारी
AI और लोकसंस्कृति का संगम, उत्तराखंड की बोलियों के संरक्षण के लिए तीन संस्थान साथ आए
*एआईएसई (एआई स्ट्रेटेजिक इंजीनियरिंग फाउंडेशन), जागर अकादमी और माया देवी विश्वविद्यालय के बीच त्रिपक्षीय एमओयू*
गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को एआई तकनीक के माध्यम से डिजिटल युग में नई पहचान देने की पहल
उत्तराखंड की समृद्ध लोकभाषाओं, लोकसाहित्य और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने तथा उन्हें आधुनिक तकनीक एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल की गई है। *एआईएसई (एआई स्ट्रेटेजिक इंजीनियरिंग फाउंडेशन), पद्म श्री प्रीतम भरतवाण की जागर अकादमी और माया देवी विश्वविद्यालय के बीच गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटल सशक्तिकरण के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए*।यह साझेदारी केवल भाषाओं के संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उत्तराखंड की मौखिक परंपराओं, लोकगीतों, जागर, पंवारा, हारुल और स्थानीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को आधुनिक डिजिटल तकनीक और एआई के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
*माया देवी विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट श्री एम. एल. जुयाल ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी समाज की वास्तविक पहचान उसकी भाषा और संस्कृति में निहित होती है। उत्तराखंड की लोकभाषाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़कर संरक्षित करना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व भी है*। माया देवी विश्वविद्यालय इस महत्वपूर्ण अभियान में हरसंभव सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।
इस अवसर पर *एआईएसई (एआई स्ट्रेटेजिक इंजीनियरिंग फाउंडेशन) के संस्थापक श्री सच्चिदानंद सेमवाल ने कहा कि यह पहल केवल भाषा बचाने का अभियान नहीं बल्कि उत्तराखंड की पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने का प्रयास है।* उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते डिजिटल दौर में नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक बोलियों से दूर होती जा रही है। यदि समय रहते इनके संरक्षण के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में हमारी लोकभाषाएं केवल पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित रह सकती हैं। उन्होंने कहा कि उद्देश्य यह है कि उत्तराखंड की भाषाएं AI के युग में भी जीवंत रहें और आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा एवं बोली में तकनीक का उपयोग कर सके।
*जागर अकादमी के संस्थापक एवं पद्म श्री सम्मानित लोकगायक श्री प्रीतम भरतवाण ने कहा कि जागर, पंवारा और हारुल केवल लोकगीत नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड की सदियों पुरानी स्मृतियों, परंपराओं और लोकचेतना के जीवंत दस्तावेज हैं,* उन्होंने कहा कि इन लोक परंपराओं में उत्तराखंड की भाषा अपने सबसे स्वाभाविक और प्रामाणिक स्वरूप में विद्यमान है। एआईएसई फाउंडेशन और माया देवी विश्वविद्यालय के साथ यह साझेदारी लोकसंस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और पवित्र प्रयास है। उन्होंने कहा, *जब तक हमारी बोली बचेगी, तब तक पहाड़ की पहचान भी जीवित रहेगी।*
इस अवसर पर *माया देवी विश्वविद्यालय की वाइस प्रेसिडेंट प्रो. (डॉ.) तृप्ति जुयाल सेमवाल ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि समाज और उसकी जड़ों से जुड़ना भी है। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए अपनी तकनीकी एवं शोध क्षमता का उपयोग अपनी ही भाषा, संस्कृति और विरासत के संरक्षण में करने का अनूठा अवसर प्रदान करेगी।* विश्वविद्यालय इस अभियान के लिए अपनी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित एआई लैब, तकनीकी संसाधनों तथा छात्र स्वयंसेवकों के माध्यम से आवश्यक सहयोग प्रदान करेगा।
माया देवी विश्वविद्यालय के *वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) आशीष सेमवाल ने कहा कि एआईएसई फाउंडेशन उत्तराखंड की हिमालयी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। उन्होंने बताया कि फाउंडेशन की “भाषा AI” पहल के अंतर्गत क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, डिजिटल दस्तावेजीकरण और तकनीकी विकास पर कार्य किया जा रहा है,* उन्होंने कहा कि माया देवी विश्वविद्यालय के साथ यह साझेदारी इस अभियान को अकादमिक, तकनीकी और शोध का मजबूत आधार प्रदान करेगी।
*साझेदारी के प्रमुख उद्देश्य*
*1. प्रामाणिक भाषा डेटा का संग्रह:*
गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार-भाबर क्षेत्र के गांवों से मूल वक्ताओं, लोक कलाकारों और वरिष्ठ नागरिकों की आवाज के नमूने, लोकगीत, लोककथाएं तथा मौखिक परंपराओं का व्यवस्थित डिजिटल संग्रह किया जाएगा।
*2. युवा भागीदारी एवं शोध:*
विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को वास्तविक क्षेत्रीय शोध, डेटा संग्रह और डिजिटल संरक्षण से जोड़ते हुए उन्हें अपनी संस्कृति और भाषाई विरासत को समझने का अवसर दिया जाएगा।
*3. तकनीक और संस्कृति का संगम:*
माया देवी विश्वविद्यालय की तकनीकी एवं शैक्षणिक क्षमता को जागर अकादमी की लोकसांस्कृतिक विशेषज्ञता तथा एआईएसई फाउंडेशन की तकनीकी पहल के साथ जोड़ा जाएगा।
*4. AI आधारित भाषा संरक्षण:*
एकत्रित भाषा डेटा को भविष्य में AI आधारित भाषा उपकरणों, डिजिटल अभिलेखागार, वॉयस टेक्नोलॉजी, शैक्षणिक सामग्री और अन्य डिजिटल संसाधनों के विकास के लिए उपयोग किया जा सकेगा।
*5. आने वाली पीढ़ियों के लिए डिजिटल विरासत:*
इस पहल का दीर्घकालिक उद्देश्य ऐसा डिजिटल भाषा-संसाधन तैयार करना है, जिसके माध्यम से भविष्य में उत्तराखंड की अपनी भाषाओं में शिक्षा, सूचना और तकनीकी सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की संभावनाएं विकसित की जा सकें।
यह पहल उत्तराखंड की लोकभाषाओं को केवल संरक्षित करने तक सीमित नहीं है बल्कि उन्हें डिजिटल युग में उपयोगी, जीवंत और तकनीकी रूप से सक्षम बनाने की दिशा में एक दूरदर्शी कदम है। इस साझेदारी से स्थानीय भाषाओं के संरक्षण के साथ-साथ विद्यार्थियों के लिए शोध, नवाचार और स्टार्टअप के नए अवसर भी विकसित होने की संभावना है।
*इस त्रिपक्षीय साझेदारी को उत्तराखंड की भाषा, लोकसंस्कृति और आधुनिक तकनीक के बीच एक सेतु के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में प्रदेश की लोकभाषाओं को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक डिजिटल मंच पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।*
कार्यक्रम में माया देवी विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट श्री एम. एल. जुयाल, वाइस प्रेसिडेंट प्रो. (डॉ.) तृप्ति जुयाल सेमवाल, वाइस चांसलर प्रो. (डॉ.) आशीष सेमवाल, एआईएसई (स्ट्रेटेजिक इंजीनियरिंग फाउंडेशन) के संस्थापक श्री सच्चिदानंद सेमवाल, रजिस्ट्रार श्रीमती अंबिका जुयाल, डीन एकेडमिक्स प्रो. (डॉ.) आर. बी. सिंह, प्रिंसिपल बीएड श्रीमती सीता जुयाल सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न स्कूलों के प्राचार्य, डीन, शिक्षक एवं अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

