देहरादून। विमेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (WIT), देहरादून द्वारा उत्तराखण्ड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (UCOST) के सहयोग से 19 से 23 मई 2026 तक “Challenges to Sustainable Development and Construction in Hilly Regions: Case Studies and Practical Solutions” विषय पर पांच दिवसीय शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग प्रोग्राम (STTP) का सफल आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन सिविल इंजीनियरिंग विभाग द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को हिमालयी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में सतत अवसंरचना विकास, आपदा प्रबंधन, भूस्खलन नियंत्रण, हिल रोड इंजीनियरिंग, जलविद्युत परियोजनाओं, भूकंपरोधी निर्माण तकनीकों, ड्रोन सर्वेक्षण, भू-स्थानिक तकनीकों तथा पर्यावरण अनुकूल निर्माण पद्धतियों से संबंधित व्यावहारिक एवं तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराना था।
कार्यक्रम के दौरान IIT रुड़की, IIT रोपड़, NIT उत्तराखण्ड, CSIR-CBRI, CSIR-CRRI, UJVNL तथा Larsen & Toubro जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों एवं उद्योगों के विशेषज्ञों ने विभिन्न तकनीकी व्याख्यान प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों ने टिहरी बांध परियोजना, ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना, सिलक्यारा टनल रेस्क्यू ऑपरेशन, धाराली आपदा, ड्रोन आधारित सर्वेक्षण तकनीकों तथा लखवाड़ बहुउद्देशीय परियोजना जैसे महत्वपूर्ण विषयों एवं केस स्टडी पर विस्तार से चर्चा की।
समापन समारोह में विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो. त्रिप्ता ठाकुर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं, जबकि UCOST के महानिदेशक डॉ. दुर्गेश पंत विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता WIT के निदेशक प्रो. मनोज कुमार पांडा ने की तथा कार्यक्रम का समन्वयन एवं संचालन सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डॉ. आयुष जोशी द्वारा किया गया।
अपने संबोधन में कुलपति प्रो. त्रिप्ता ठाकुर ने कहा कि हिमालयी राज्यों में तकनीकी शिक्षा, शोध एवं नवाचार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों को सतत विकास, आपदा प्रबंधन तथा स्थानीय समस्याओं से जुड़े अनुसंधान के प्रति प्रेरित किया तथा कहा कि विश्वविद्यालय भविष्य में भी इस प्रकार के अकादमिक एवं कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देता रहेगा।
UCOST के महानिदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने सिलक्यारा टनल दुर्घटना एवं रेस्क्यू ऑपरेशन का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी अवसंरचना परियोजना के लिए वैज्ञानिक अध्ययन, भू-तकनीकी विश्लेषण, निरंतर मॉनिटरिंग तथा प्रभावी आपदा प्रबंधन प्रणाली अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सिलक्यारा रेस्क्यू ऑपरेशन इंजीनियरों, वैज्ञानिकों, भूवैज्ञानिकों, रैट माइनर्स तथा विभिन्न एजेंसियों के सामूहिक प्रयासों का उत्कृष्ट उदाहरण था। उन्होंने जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), ड्रोन आधारित सर्वेक्षण तकनीकों तथा आपदा-रोधी अवसंरचना विकास जैसे विषयों पर विशेष बल दिया।
कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। आयोजकों के अनुसार यह एसटीटीपी विद्यार्थियों के लिए तकनीकी ज्ञान, शोध अभिरुचि तथा व्यावसायिक नेटवर्क विकसित करने हेतु एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।
