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“वृक्षाबंधन अभियान” के तत्वाधान में अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस पर सम्पन्न हुई गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम

 

वृक्षाबंधन अभियान” के तत्वाधान में लोक भाषाओं पर चर्चा और अपनी अपनी भाषाओं में काव्य रचनाएं, गीत, संस्मरण  का शानदार प्रस्तुतीकरण

आज अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस के मौके पर सर्किट हाउस एनेक्षी स्थित राज्य अथिति गृह सभागार में “वृक्षाबंधन अभियान” के तत्वाधान में लोक भाषाओं पर चर्चा और अपनी अपनी भाषाओं में काव्य रचनाएं, गीत, संस्मरण इत्यादि का शानदार प्रस्तुतीकरण किया गया। आज के कार्यक्रम में सभी वर्ग के आमजन की सराहनीय भागीदारी रही। आज के कार्यक्रम का संचालन करते हुए कु० मीनाक्षी नकोटी ने सर्वप्रथम भजन गायन एवं माँ सरस्वती वंदना से से कार्यक्रम का शुभारंभ किया, जिससे वातावरण अत्यंत शुभकारी एवं अलौकिक भाव देने लगा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथियों कर्नल (डॉ) देव प्रसाद डिमरी (उत्तरायणी के पूर्व अध्यक्ष), वृक्षाबंधन अभियान के संस्थापक विचारक सैनिक शिरोमणि मनोज ध्यानी, उत्तराखंड आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री एवं मिनी सेविका संगठन की केंद्रीय अध्यक्ष श्रीमती रेखा नेगी, आल इंडिया फ्रीडम फाइटर्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती (डॉ) आशा लाल, केंद्रीय विद्यालय संगठन से पूर्व प्राचार्य बिंदु सिन्हा को आसन्न गृहण करवाया गया। स्थानीय मातृ भाषा के प्रतिभागियों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के कार्यक्रम का शुभारंभ वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी श्रीमती रेवती बिष्ट और श्रीमती तारा पांडे ने कुमाऊनी भाषा के पिछाड़ा पर मनमोहक नृत्य एवं गान प्रस्तुति दी। तदुपरांत वरिष्ठ राज्य सेनानी श्रीमती आशा नौटियाल, श्रीमती साबी नेगी, श्रीमती तारा पांडे ने गढ़वाल के प्रसिद्ध लोक भाषा के गीत “बेड पाको बारा मासा” का जीवंत प्रस्तुति करण दिया। अपनी मातृ भाषा से गढ़वाली भाषा में काव्य पाठ सुनाने पर कु० साक्षी जुयाल ने खूब तालियाँ बटोरी। जबकि भारतीय राष्ट्रीय कैडेट कॉर्प्स की कु० सृष्टि जुयाल ने गढ़वाली भाषा में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कैडेटों के संस्मरण सुनाए। केंद्रीय विद्यालय की सेवानिवृत्त प्राचार्य सुश्री बिंदु सिन्हा का उद्बोधन मार्मिक रहा। उन्होंने राष्ट्र की राज भाषा में भाषा के महत्व, भाषा इतिहास और भाषा आधारित संस्कृति के सभी पहलुओं को गहराई से छुआ। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय लोक किंवदंतियों पर मर्म छुने वाले पाठ सुनाये और आज के युग में समूचे जगत के लिये प्रेम और सम्मान की संस्कृति को विकसित करने पर बल दिया। उत्तराखंड आंगनवाड़ी कार्यकर्त्री एवं मिनी सेविका संगठन की केंद्रीय अध्यक्ष श्रीमती रेखा नेगी ने अपना समूचा व्याख्यान अपनी मातृ भाषा गढ़वाली में दिया। उन्होंने हिमांचल प्रदेश में सम्पन्न हुए राष्ट्रीय अधिवेशन के अपने उन संस्मरणों को सुनाया, जब उनके द्वारा ठेठ मातृ भाषा पर बोलने पर उन्हें व उनकी टीम को पाँचवां स्थान प्रदान कर झारखंड में आयोजित भाषायी संवाद सम्मेलन हेतु चुन लिया गया था। उन्होंने आम बोलचाल की भाषा में गढ़वाली भाषा में संवाद करने हेतु आज की युवा पीढ़ी के लिये आवश्यक संस्कार जनित करने की आवश्यकता बताया। समाजसेविका श्रीमती राधा तिवारी ने अपनी मातृ भाषा गढ़वाली में अपनी सैन्य अधिकारी बेटी के एवरेस्ट फतह करने का खूबसूरत संस्मरण सुनाया, जो कि आये हुय युवाओं में मनोबल संचारित करने वाला रहा। दून विश्विद्यालय की अर्थशास्त्र विज्ञान की छात्रा कु० संस्कृति, कु० विनीता और कु० दिया इंदिरा ध्यानी ने आधुनिक आर्थिकी में स्थानीय भाषा बोली की भूमिका को उखेरकर रखा। श्री वीर बलभद्र सोसाइटी की अध्यक्ष श्रीमती अनिता शास्त्री ने अपनी मातृ भाषा गोरखाली में सुंदर रचनाएं, स्वरचित काव्य पाठ प्रस्तुत किया, जिसको सभी के द्वारा खूब सराहा गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के शौर्य से जुड़े संस्मरण राष्ट्र भाषा हिन्दी एवं अपनी मातृ भाषा कुमाऊनी (संयुक्त में) सुनाकर डॉ आशा लाल ने खूब तालियाँ बटोरी। कु० ईशा गैरोला ने अपनी मातृ भाषा गढ़वाली में गुरुजनों की भक्ति पर सुंदर व्याख्यान प्रस्तुत किया। वरिष्ठ आंदोलनकारी एवं सचिवालय कर्मी श्री सुनील जुयाल ने भी शुद्ध गढ़वाली बोली में अपना उद्बोधन दिया और क्षेत्रीय भाषा को अधिक से अधिक प्रयोग करने का आह्वान किया। भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर डॉ प्रवीण कुमार ने मातृ भाषा को किसी भी मनुष्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का आईना बताया। उन्होंने आधुनिक युग की जटिल विषमताओं के मध्य स्थानीय भाषा बोली में संवाद को तनाव भरे जीवन में अमृत घुट्टी बताया। श्रीमती शिल्पा देवी ने अपने विशिष्ट हरियाणवी शैली में जीवंत उदाहरण प्रस्तुति स्वरूप सुनाये। उन्होंने बतौर एक माँ अपने बच्चों में मातृ भाषा को कैसे रोपित किया जाए, के अपने प्रयोगधर्मी उपाय बताए। तिब्बत एवं बौद्ध संस्कृति की प्रख्यात समाज सेविका शेरीन लुंडिग ने तिब्बत में बोली जाने वाली भोटी भाषा में बौद्ध धर्म की सीखों को पहले भोटी भाषा में फिर उसका अनुवाद अंग्रेजी में सुनाए। उन्होंने वृक्षाबंधन अभियान की पहल को उत्तम श्रेणी की पहल बताया। अवकाश प्राप्त कर्नल (डॉ) देव प्रसाद डिमरी ने अपना भाष्य गढ़वाली व हिंदी में संयुक्त रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने मातृ भाषा पर अपने आने वाले ऐप आखर के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि आखर नाम से आ रहे ऐप में अंग्रेजी अथवा हिंदी के आम बोलचाल के शब्दों के अर्थ बड़ी ही सरलता से गढ़वाली, कुमाऊनी एवं जौनसारी भाषा में कैसे पुकारा जाए जाना जा सकता है। उन्होंने बताया कि आने वाला भाषा ऐप आखर गढ़वाली कुमाऊनी और जौनसारी जानने की इच्छा रखने वालों के लिये चलती फिरती डिजिटल डायरी होगी। उन्होंने बताया कि आखर ऐप पूरी तरह से बनकर तैयार है और शीघ्र ही इसको राज्य के राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री द्वारा विमोचन करवाकर जनता को सुपुर्द कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि आखर की अग्रिम प्रति “वृक्षाबंधन अभियान” को सौंपा जाना न्यायसंगत होगा। राष्ट्रीय पैरा ओलिंपिक्स एसोसिएशन की राष्ट्रीय अध्यक्ष भूमिका यादव ने भाषायी बाधाओं को दूर करने में राजभाषा हिंदी के महत्व को उखेरा। परन्तु साथ में जोर देकर कहा कि जिस प्रकार से राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा हेतु राष्ट्रीय भाषा में आदान प्रदान करना आवश्यक है उसी प्रकार से क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में मातृ भाषा का होना भी जरूरी हो जाता है। पत्रकार श्री राकेश ध्यानी ने अपना उद्बोधन शुद्ध गढ़वाली में प्रस्तुत करते हुए स्थानीय भाषा के विलुप्त हो रहे कारकों की पहचान करने की जरूरत पर बल दिया। आज के कार्यक्रम की आयोजनकर्ता संगठन वृक्षाबंधन अभियान के संस्थापक विचारक “सैनिक शिरोमणि” मनोज ध्यानी ने अपना उद्बोधन राजभाषा हिंदी, राज्य की दूसरी भाषा संस्कृत और मातृ भाषा गढ़वाली में मिश्रित स्वरूप में दिया। श्री मनोज ध्यानी ने बताया कि विगत वर्ष 2022 से 2032 तक संयुक्त राष्ट्र के द्वारा समूचे दशक को स्थानीय भाषाओं का दशक (Decade of Indigenous Languages) घोषित किया हुआ है। और विश्वभर में ऐसे प्रयास हो रहे हैं कि स्थानीय भाषाओं का संरक्षण और विकास किया जाए। उन्होंने बताया कि भारत की केंद्रीय सरकार ने नई शिक्षा नीति के द्वारा स्थानीय भाषा बोलियों के संरक्षण एवं विकास हेतु ठोस कदम बढ़ाएं हैं। उत्तराखंड में भी राज्य सरकार की ओर से कारगर कदम इस दिशा में दृष्टिगोचर हो रहे हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं में राज्य से संबंधित प्रश्नावली इसी ओर सार्थक कदम है। श्री ध्यानी ने कहा कि आज का आयोजन किसी विशेष बोली और भाषा के पक्ष में न होकर अपनी अपनी भाषा बाेली में संवाद करने को प्रेरणा देने के लिये सृजित की गई थी, जो कि आशातीत रूप में सफल भी रही। उन्होंने बताया कि कैसे विश्व में कभी 8624 भाषा बोलियों प्रचलन में हुआ करती थी जो कि अब सिमटकर 7000 ही रह गई हैं। भारत भूमि में 3000 से अधिक भाषा बोलियों का बोला जाना को उन्होंने अभूतपूर्व बताया। उन्होंने कहा कि समाज को जहाँ आधुनिक युग के साथ दौड़ लगाने के लिये आने वाली पीढ़ियों को अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में पारंगत बनाने का क्रम जारी रखना होगा वहीं सांस्कृतिक धरोहर को बचाने हेतु मातृ भाषा को भी अंगीकार करना होगा। उन्होंने उत्तराखंड में राजभाषा के साथ संस्कृत भाषा के जुड़ने को अलौकिक विषय बताया, और इससे उपजने वाले भविष्य के परिणामों को सभी के लिये सुखकारी और अनुकरणीय होने वाला बताया। श्री ध्यानी ने विमर्श सभा के अनुरोध पर अपने उद्बोधन को हरिनाम मंत्र के साथ पूर्ण किया जिसमें सभी ने सुर में सुर मिलाकर साथ दिया। मीनाक्षी नाकोटी ने सभी का साधुवाद ज्ञापित किया। समूची भागीदारी निम्नवत प्रकार से रही :-:कर्नल (डॉ( डी पी डिमरी, तारा पांडे, रेवती बिष्ट, राधा तिवारी, कमला गैरोला, कु० विनीता, कु० ईशा गैरोला, कु० दिया इंदिरा ध्यानी, कु० सृष्टि जुयाल, कु० साक्षी जुयाल, साबी नेगी, आशा नौटियाल, रेखा नेगी, “सैनिक शिरोमणि” मनोज ध्यानी (विचारक एवं कार्यक्रम संयोजक), श्रीमती शिल्पा देवी, डॉ प्रवीण कुमार, कु० संस्कृति, श्रीमती शांति वर्मा, सुश्री बिंदु सिन्हा, डॉ आशा लाल, सुनील जुयाल, देव सिंह चौहान, श्रीमती अनिता शास्त्री, सुश्री भूमिका यादव, श्रीमती शेरिन लुडिग, हरि नागर, कु० मीनाक्षी नकोटी (कार्यक्रम संचालिका), प्रकाश नागिया आदि।

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