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इतिहास:  उत्तरकाशी में स्मृतियों का घर, प्रताप संग्रहालय और एक शिक्षक का संघर्ष

 

स्लेट, पाटी, धुलेट और एक जीवन का इतिहास

घाट रोड, उत्तरकाशी का वह घर बाहर से किसी आम पहाड़ी मकान जैसा दिखाई देता है—न कोई बड़ी तामझाम, न कोई शोरगुल। लेकिन जैसे ही उसके भीतर पैर पड़ते हैं, समय की दिशा पलट जाती है। बाहर गंगा निरंतर आगे बढ़ रही होती है और भीतर स्मृतियों की धारा पीछे की ओर बहने लगती है। यह घर दीवारों से नहीं, वर्षों की साधना से बना है। यह प्रताप संग्रहालय है—और यह किसी संस्था का नहीं, एक व्यक्ति की चेतना का विस्तार है। उस व्यक्ति का नाम है—प्रताप सिंह बिष्ट ‘संघर्ष’।

“संघर्ष” राजकीय इंटर कॉलेज से प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए प्रताप सिंह बिष्ट को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया जाना औपचारिक प्रशस्ति नहीं, बल्कि उस शिक्षा-परंपरा की स्वीकृति है, जिसकी जड़ें पहाड़ के गाँव-गाँव तक फैली हुई हैं। गढ़वाल में विद्यालय केवल ज्ञान का केंद्र नहीं रहे हैं, वे सामाजिक पुनर्निर्माण के स्थल रहे हैं। अंग्रेज़ी शासन के समय खुले प्राथमिक विद्यालयों से लेकर आज के इंटर कॉलेजों तक, यहाँ शिक्षा हमेशा संघर्ष के बीच पली है—भूगोल के संघर्ष, संसाधनों के संघर्ष और पलायन के संघर्ष के बीच। प्रताप सिंह बिष्ट ‘संघर्ष’ उसी परंपरा के प्रतिनिधि शिक्षक हैं, जिनका जीवन स्वयं उसी संघर्ष का अनुशासित दस्तावेज़ बन गया।

मूल रूप से टिहरी जनपद के थौलधार ब्लॉक की पट्टी गुसाईं के धरवालगांव से जुड़े होने के बावजूद उत्तरकाशी उनकी कर्मभूमि बना और सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने उस भूमि को छोड़ना स्वीकार नहीं किया। यह निर्णय साधारण नहीं था। यह उस दौर में लिया गया निर्णय था, जब पहाड़ में सेवा करने वाला व्यक्ति भी सेवा समाप्त होते ही मैदान की ओर उतर जाता है। पहाड़ तब पीछे छूटता है—बोझ की तरह, स्मृति की तरह, किंतु उत्तरदायित्व की तरह नहीं। प्रताप सिंह बिष्ट ‘संघर्ष’ ने इस प्रवृत्ति को अस्वीकार किया। उन्होंने उत्तरकाशी में ही घर खरीदा और उसे निजी सुख-सुविधा के लिए नहीं, सामूहिक स्मृति के विस्तार के लिए खोल दिया। तिबार हाउस नाम का वह साधारण सा भवन धीरे-धीरे एक सामाजिक स्मारक में बदल गया—प्रताप संग्रहालय।

इस संग्रहालय में प्रवेश करते ही जो पहली त्रयी सामने आती है—स्लेट, पाटी और धुलेट—वह केवल शैक्षिक उपकरण नहीं है, वह पर्वतीय क्षेत्रों की शिक्षा-संस्कृति का मौन इतिहास है। बीसवीं सदी के पहले आधे हिस्से में पहाड़ के गाँवों में स्लेट ही अध्ययन का मुख्य साधन थी। कॉपियों का चलन बाद में आया, उससे पहले बच्चे अपनी उंगलियों से मिट्टी या धुलेट पर ही अक्षर रचते थे। धुलेट का यह संस्कार गढ़वाल ही नहीं, पूरे हिमालयी क्षेत्र में शिक्षा के आदिम स्वरूप का संकेत देता है। पाटी, जिस पर शिक्षक की लकड़ी की छड़ी क्रम, अनुशासन और भय—तीनों को एक साथ रचती थी, केवल दंड का उपकरण नहीं थी, वह सामाजिक अनुशासन की प्रतीक थी।

आज जब बच्चे टैबलेट पर लिखना सीख रहे हैं, स्लेट–पाटी–धुलेट का एक साथ सुरक्षित होना किसी संग्रह से अधिक, एक सभ्यता के संक्रमण का दस्तावेज़ है। यही नहीं, संग्रहालय में रखी गई हर पुरानी घड़ी औद्योगिक समयबोध के पहाड़ में आगमन की गवाही देती है। तांबे-पीतल के बर्तन उस घरेलू उत्पादन-व्यवस्था का स्मरण कराते हैं, जब बाज़ार नहीं, घर आत्मनिर्भर हुआ करते थे। खेती के औजार उस श्रम-संस्कृति के साक्ष्य हैं, जिसमें प्रकृति के साथ युद्ध नहीं, संवाद होता था।

मेरे अपने भ्रमण का अनुभव इस संग्रहालय को केवल देखने का अनुभव नहीं था। वह भीतर उतरने की प्रक्रिया थी। मैं पिछले रविवार अपने मित्रों के साथ वहाँ पहुँचा। लगभग डेढ़ घंटे तक हम उस घर के भीतर रहे, किंतु वह घर उस समय केवल एक भवन नहीं रह गया था—वह हमारा संयुक्त अतीत बन गया था। हर वस्तु को देखते समय कोई न कोई स्मृति भीतर से उठ खड़ी होती थी। किसी की आँख स्लेट पर टिकती तो उसका बचपन सामने आ जाता, किसी को तांबे के बर्तन देखकर उसकी माँ की रसोई याद आ जाती, किसी को खेती के औजार देखकर उसका गाँव। यह अनुभव बताता है कि प्रताप संग्रहालय वस्तुओं का नहीं, स्मृतियों का संग्रहालय है।

गुरुजी स्वयं हर व्यक्ति को वस्तुओं का इतिहास बताते हैं। उनके शब्दों में न संग्रहालय-शास्त्र का शुष्कपन है, न विद्वत्ता का प्रदर्शन। वहाँ जीवन का सहज अनुभव बहता है। वे बताते हैं कि कैसे एक-एक वस्तु लोगों से मांगकर, कभी उपहार में, कभी वर्षों की खोज के बाद उस घर में पहुँची। इस क्रम में यह भी स्पष्ट होता है कि यह संग्रहालय किसी योजना का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सांस्कृतिक साधना का फल है।

यह भी उल्लेखनीय है कि उत्तरकाशी में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में भी कुछ पुरातात्विक सामग्री सुरक्षित है, किंतु प्रताप संग्रहालय की विशेषता इसका गैर-औपचारिक होना है। यहाँ कोई काँच के शोकेस का घमंड नहीं, कोई सूचना-पट्टिकाओं की भाषा नहीं। यहाँ वस्तु और व्यक्ति के बीच दूरी नहीं है। यहाँ इतिहास हाथ पकड़कर वर्तमान से बात करता है।

गढ़वाली संस्कृति यहाँ किसी व्याख्यान के रूप में नहीं, अनुभव के रूप में उपस्थित होती है। ढोल–दमाऊ की गूँज वस्तुओं के बीच मौन रूप में मौजूद रहती है। लकड़ी की नक्काशीदार पट्टियाँ गढ़वाल के वास्तुकला इतिहास की कहानी कहती हैं। तांबे के पात्र आयुर्वेदिक जीवन-दर्शन से जुड़ते हैं। यह समूचा वातावरण बताता है कि यह समाज साधनों से नहीं, संतुलन से चलता था।

यह संग्रहालय आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल अतीत का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी है। यह बताता है कि जब तकनीक जीवन पर पूरी तरह हावी हो जाती है, तब मनुष्य अपने श्रम, अपने समय और अपने रिश्तों से दूर हो जाता है। यहाँ रखा हर औजार यह याद दिलाता है कि मनुष्य पहले अपने हाथों से चीजें बनाता था, अब केवल बटन दबाता है।

प्रताप सिंह बिष्ट ‘संघर्ष’ का जीवन इस संग्रहालय का मौन पाठ्यक्रम है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन विश्राम नहीं, समाज के प्रति अधिक गहरी जिम्मेदारी का समय हो सकता है। उन्होंने शिक्षा के बाद संस्कृति को अपनी साधना बनाया। यह संग्रहालय उनका भाषण नहीं, उनका जीवन है।

उत्तरकाशी अब केवल गंगा, विश्वनाथ और पर्वतारोहण का नगर नहीं रहा, वह स्मृति-संरक्षण का भी नगर बनता जा रहा है। और इस परिवर्तन के केंद्र में एक शिक्षक खड़ा है—जिसने जीवन भर पढ़ाया और सेवानिवृत्ति के बाद भी पढ़ा रहा है, केवल किताब बदल गई है, कक्षा बदल गई है, पर शिक्षा का दीपक नहीं बुझा है।

शीशपाल गुसाईं, प्रताप संग्रहालय उत्तरकाशी में

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