हर वर्ष 22 दिसंबर को देश भर में राष्ट्रीय गणित दिवस मनाया जाता है, किंतु एक कड़वा सत्य यह है कि इस दिवस को वह स्वरूप और सम्मान अब तक नहीं मिल पाया है, जिसका वह वास्तविक अधिकारी है। किसी राजनेता का जन्मदिन हो तो मंच सज जाते हैं, पोस्टर लगते हैं और टीवी चैनलों पर दिन-भर चर्चा चलती है। किसी बाबा या गुरु की जयंती हो तो हम उनके गुणगान में शब्दों की वर्षा कर देते हैं। परंतु उसी समाज में एक ऐसा भारतीय हुआ, जो कि अनंत (इंफिनिटी) को जानता था, जिसने करीब सवा सौ साल पहले सात समंदर पार जाकर भारतीय ज्ञान की अलख जगाई, उनके जन्मदिन पर टीवी चैनल मौन रहे और अधिकतर अख़बारों में एक पंक्ति तक नहीं छपी। वह भारतीय था श्रीनिवास रामानुजन, जिसने मात्र 32 वर्षों के जीवनकाल में भारतीय ज्ञान-परंपरा की मशाल को विश्व के सबसे ऊँचे शिखरों तक पहुँचा दिया। 22 दिसंबर केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस अद्वितीय प्रतिभा को नमन करने का अवसर है, जिसने संख्याओं को नई भाषा दी। यह दिन गणित के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित है।
वर्ष 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रामानुजन की 125वीं जयंती के अवसर पर 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस घोषित करने की ऐतिहासिक घोषणा की थी। इसके पीछे दो स्पष्ट उद्देश्य थे: पहला, भारत में STEM शिक्षा को बढ़ावा देना, और दूसरा, उस महान विभूति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, जिसने सीमित संसाधनों और विषम परिस्थितियों में भी विश्व को गणित की अमूल्य धरोहर दी।
रामानुजन का जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन गणित के प्रति उनका प्रेम इतना गहरा था कि जटिल से जटिल समस्याएँ भी उनके सामने सरल हो जाती थीं। उन्होंने लगभग 3900 गणितीय प्रमेय, सूत्र, परिणाम और अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें से अनेक प्रमेय आज भी गणितज्ञों के लिए अबूझ पहेलियाँ बानी हैं। कहा जाता है कि “पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं”, यह कहावत उनके जीवन पर पूर्णतः खरी उतरती है। आठ-नौ वर्ष की आयु में ही वे अपने अध्यापकों से ऐसे गूढ़ प्रश्न पूछते थे, जिनके उत्तर देना सरल नहीं होता था। संख्याएँ उनके लिए केवल अंक नहीं, बल्कि जीवित सत्य थीं। उनके जीवन से जुड़े कुछ प्रेरक प्रसंग अत्यंत सहज और विचारोत्तेजक हैं। एक बार कक्षा में उनके अध्यापक ने पढ़ाया कि किसी भी संख्या को उसी संख्या से विभाजित करने पर उत्तर सदैव एक आता है। यह सुनकर बालक रामानुजन ने तुरंत प्रश्न किया, “क्या शून्य को शून्य से विभाजित करने पर भी उत्तर एक ही आएगा?” अध्यापक के “हाँ ” कहने पर वह गहरी सोच में डूब गए। उन्होंने इसे जीवन के उदाहरण से समझने की कोशिश की यदि मेरे पास एक भी अमरूद न हो और मैं अपने मित्र को कुछ न दूँ, तो वह एक अमरूद कैसे खा सकता है? यह प्रसंग बताता है कि रामानुजन बचपन से ही रटे-रटाए उत्तरों से संतुष्ट नहीं होते थे, बल्कि तर्क के मूल तक पहुँचने की कोशिश करते थे।
उनके जीवन पर यह कथन भी पूरी तरह लागू होता है कि प्रतिभा डिग्री और प्रमाण-पत्रों की मोहताज नहीं होती। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफेसर जी. एच. हार्डी को अपने सूत्र और उन समस्याओं के समाधान भेजे, जिन्हें उस समय असंभव माना जाता था। हार्डी रामानुजन की मौलिक सोच और असाधारण अंतर्ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें इंग्लैंड आमंत्रित किया। वहाँ दोनों के सहयोग से गणित के क्षेत्र में ऐतिहासिक शोध कार्य हुए। यह स्वयं में असाधारण उपलब्धि थी।
भूख, बीमारी और कठिन परिस्थितियाँ भी गणित के प्रति उनकी रुचि को रोक नहीं सकीं। इंग्लैंड में लंबे समय तक अस्वस्थ रहने के बावजूद वे अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे गणितीय सूत्र लिखते रहते थे। ऐसा ही एक प्रसिद्ध प्रसंग है, जब प्रोफेसर हार्डी उनसे मिलने अस्पताल आए और बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी टैक्सी के नंबर 1729 को “एक साधारण और बकवास नंबर” कहा। यह सुनते ही बीमार अवस्था में भी रामानुजन की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने कहा, “नहीं, यह एक अत्यंत रोचक संख्या है। यह सबसे छोटी संख्या है जिसे दो अलग-अलग तरीकों से दो संख्याओं के घनों के योग के रूप में लिखा जा सकता है।“ 1729 =10^3+ 9^3 =12^3 + 1^3 . एक बीमार व्यक्ति द्वारा कुछ ही क्षणों में किसी अनजान संख्या की ऐसी व्याख्या कर देना यह सिद्ध करता है कि रामानुजन केवल गणितज्ञ नहीं थे,वे संख्याओं के बाजीगर, और सच्चे अर्थों में अनंत के द्रष्टा थे।
रामानुजन रॉयल सोसाइटी के फेलो बनने वाले दूसरे भारतीय थे। उनसे पहले यह सम्मान जहाज़ डिज़ाइनर और पारसी इंजीनियर अरदेशीर कर्सेटजी वाडिया को मिला था। इसके अतिरिक्त, उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज की फेलोशिप भी प्राप्त हुई, यह सम्मान पाने वाले वे पहले भारतीय थे। अक्सर कहा जाता है कि रामानुजन “अनंत (Infinity) को जानते थे।” गणितीय दृष्टि से अनंत का अर्थ है कभी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया। किंतु रामानुजन द्वारा दी गई Infinite Series अनंत होते हुए भी सरल और सटीक उत्तर तक पहुँच जाती हैं, अर्थात वे converge करती हैं। यही विशेषता आज के सुपरकंप्यूटर, क्रिप्टोग्राफी और आधुनिक एल्गोरिदम की आधारशिला है। प्रोफेसर हार्डी कहा करते थे कि रामानुजन के सूत्र ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वे अनंत से सीधे उतरे हों।
रामानुजन का योगदान केवल सैद्धांतिक नहीं था। उनकी π (पाई) से संबंधित श्रृंखलाएँ, सैटेलाइट नेविगेशन, अंतरिक्ष विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान में उपयोग की जाती हैं। उनका थीटा फ़ंक्शन भौतिकी, क्वांटम मैकेनिक्स और चिकित्सा विज्ञान में विशेषकर कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि के पैटर्न समझने में सहायक सिद्ध हो रहा है। उनकी Infinite Series और Summation Formulas का प्रयोग आज वेव थ्योरी, सिग्नल प्रोसेसिंग, अर्थशास्त्रीय मॉडलिंग और डेटा साइंस में किया जा रहा है।
आश्चर्य की बात यह है कि जिन अवधारणाओं को रामानुजन ने एक शताब्दी पहले केवल अपनी अंतर्ज्ञान शक्ति से लिखा था, उनकी वैज्ञानिक व्याख्या आज के गणितज्ञ और भौतिक विज्ञानी कर पा रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि वे अपने समय से कई दशक आगे थे। रामानुजन केवल गणितज्ञ नहीं थे; वे उस परंपरा के प्रतिनिधि थे जहाँ ज्ञान, साधना और अंतर्ज्ञान एक-दूसरे से अलग नहीं माने जाते। वे स्वयं कहते थे कि उनकी कुलदेवी ‘नमगिरी’ उन्हें नए-नए प्रमेय लिखने के लिए प्रेरित करती थीं। आधुनिक दृष्टि इसे आस्था कहकर टाल सकती है, लेकिन यही वह बिंदु था जहाँ अनंत, सत्य, तर्क, चिंतन और वैज्ञानिक बौद्धिकता का अद्भुत संगम होता है।
आज, विज्ञान, तकनीक और AI के युग में, जब हम भविष्य की जटिल चुनौतियों का समाधान खोज रहे हैं, तब रामानुजन के विचार हमारे मार्गदर्शक बने हुए हैं। फिर भी विडंबना यह है कि उनका जन्मदिन हमारे शैक्षणिक परिसरों में भी औपचारिकता तक सीमित रह गया है। यदि हम सचमुच “विकसित भारत” की संकल्पना को गंभीरता से लेते हैं, तो 22 दिसंबर केवल एक तारीख नहीं रहनी चाहिए। यह दिन हर विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में गणितीय चेतना के उत्सव के रूप में मनाया जाना चाहिए। हमें यह समझाना चाहिए कि गणित को कैसे अपने रोजमर्रा के जीवन में लाएं। कैसे इस को सलूशन फाइंडर बनायें। विशेषकर इस दिन गणतीय परिचर्चा, पोस्टर और लोगो बनाने की प्रतियोगिता, क्विज, सिम्पोजियम आदि कार्यक्रमों से गणितीय चेतना लाना श्रीनिवास रामानुजन को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
छात्रों को यह समझना होगा कि भारत की आत्मा केवल मंत्र, ध्यान और योग तक सीमित नहीं है बल्कि इन सबकी बुनियाद में हमारा गणितीय ज्ञान ही है। जिस देश को हम विश्वगुरु कहने का स्वप्न देखते हैं, उसकी वास्तविक शक्ति तर्क, संख्या, संरचना और सत्य की खोज में निहित है। रामानुजन उसी शक्ति के प्रतीक थे। हमें रामानुजन को याद करने के बहाने ही सही, गणित को फिर से अपने जीवन का आधार बनाना होगा। क्योंकि जब समाज गणित से दूरी बनाता है, तब वह केवल भावनाओं में जीता है, और जब गणित से जुड़ता है, तब वह भविष्य गढ़ता है।
( चन्दन घुघत्याल, गणित विभागाध्यक्ष, द दून स्कूल )
