दुखद: भारत के पहले कृषि विश्वविद्यालय में छात्र ने लगाई फांसी, पहले भी छात्रों के आत्महत्या के मामले आ चुके हैं सामने
विशेष रिपोर्ट | पंतनगर
देश को भुखमरी से निकालकर ‘हरित क्रांति’ की सौगात देने वाला गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GBPUAT) आज अपनी उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि अपने ही आंगन में दम तोड़ते युवा सपनों के कारण चर्चा में है।
विश्वविद्यालय के छात्रावास में आज फिर एक सन्नाटा पसर गया, जब बीटेक तृतीय वर्ष (B.Tech 3rd Year) के एक छात्र ने आत्महत्या जैसा घातक कदम उठा लिया। पुलिस मामले की जांच कर रही है, लेकिन परिसर में छात्रों के बीच शोक और दहशत का माहौल है। यह महज एक छात्र की मौत नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर लगा प्रश्नचिह्न है, जो देश के भविष्य को संभालने का दावा करती है।
* सिलसिला जो थम नहीं रहा
चिंतनीय विषय यह है कि यह कोई अकेली या आकस्मिक घटना नहीं है। पंतनगर विश्वविद्यालय में आत्महत्याओं का एक डरावना पैटर्न (Pattern) बनता जा रहा है।
अभी इस घाव के भरने से पहले ही, कुछ समय पूर्व बीटेक प्रथम वर्ष के एक छात्र ने भी इसी तरह अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली थी।
आंकड़ों और पुराने रिकॉर्ड पर नजर डालें, तो पूर्व में भी कई छात्रों ने तनाव या अन्य कारणों से आत्महत्या का रास्ता चुना है। एक के बाद एक हो रही ये घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि दीवारें दरक रही हैं, लेकिन शायद उन्हें देखने वाला कोई नहीं है।
* प्रतिष्ठा बनाम मानसिक दबाव
उत्तराखंड के तराई में स्थित यह विश्वविद्यालय देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय है। इसका इतिहास गौरवशाली रहा है। यहाँ एडमिशन लेना लाखों छात्रों का सपना होता है। लेकिन सवाल यह है कि इस ‘ड्रीम कैंपस’ के भीतर ऐसा क्या है जो छात्रों को जिंदगी से ज्यादा मौत को चुनने पर मजबूर कर रहा है?
क्या यह अकादमिक दबाव (Academic Pressure) है? क्या यह रैगिंग या सीनियर-जूनियर के बीच का तनाव है? या फिर घर से दूर रहने वाला अकेलापन? कारण चाहे जो भी हो, यह स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) को समझने और संभालने में कहीं न कहीं चूक रहा है।
* चिंतन का विषय: हम कहां चूक रहे हैं? आज हुई बीटेक छात्र की आत्महत्या हमें झकझोरने के लिए काफी होनी चाहिए।
* काउंसलिंग की कमी: क्या विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए कोई प्रभावी ‘मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम’ है? अगर है, तो क्या छात्र उस तक पहुंच पा रहे हैं?
* संवादहीनता: क्या प्रोफेसरों और छात्रों के बीच, या वार्डन और हॉस्टल के छात्रों के बीच संवाद की कमी है जिससे छात्र अपनी परेशानी साझा नहीं कर पाते?
* अभिभावकों की चिंता: जिस भरोसे के साथ माता-पिता अपने बच्चों को इस प्रतिष्ठित संस्थान में भेजते हैं, ऐसी घटनाएं उस भरोसे को तोड़ती हैं।
अब वक्त है जागने का – पंतनगर विश्वविद्यालय सिर्फ एक शिक्षण संस्थान नहीं, एक धरोहर है। लेकिन अगर इसकी मिट्टी में छात्रों के सपने ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो इसकी उपलब्धियां बेमानी होंगी।
प्रशासन को अब ‘जांच कमेटी’ बनाने की रस्म अदायगी से आगे बढ़ना होगा। जरूरत है एक ऐसे माहौल की जहां छात्र अपनी कमजोरी, अपने डर और अपने तनाव पर खुल कर बात कर सकें। यह समय है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, फैकल्टी और सरकार मिलकर यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में कोई और छात्र फांसी के फंदे को अपना समाधान न माने।
आज जिस छात्र ने जान दी, उसके परिवार के प्रति संवेदनाएं हैं, लेकिन असली श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम यह सुनिश्चित करें कि यह “आखिरी खबर” हो।
अगर आप या आपका कोई परिचित तनाव से गुजर रहा है, तो कृपया मदद मांगें। बात करने से रास्ते निकलते हैं।
लेखक :- पवन दूबे, समाजसेवी, उत्तराखण्ड प्रदेश
