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ग्रामीण भारत में निवासरत लोगों के लिए भारत सरकार के दोहरे मापदंड क्यों….? 

 

 

उत्तराखंड राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों, मार्च महीने में बनें जून जुलाई जैसी बरसाती मौसम के बीच, ऊपर से लकड़ी काटने पर वन विभाग की सख्ती, बिजली के आसमान छूते दामों के बीच यदि घरेलू गैस उपभोक्ताओं पर भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा पिछली गैस डिलीवरी से 45 दिन के उपरांत ही गैस बुकिंग की बाध्यता की गई है, जिससे यह तो स्पष्ट होता है, कि मंत्रालय में बैठे लोगों की मानसिकता उत्तराखंड राज्य के ग्रामीण क्षेत्र के उपभोक्ताओं के प्रति आज भी यह बनी है, कि ये लोग गैस सिलेंडर के अलावा अतिरिक्त किसी इंधन का उपयोग करते हैं,या खाना ही नहीं खाते हैं। अब इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्ष 2015-16 से उत्तराखंड में पूर्ण रूप से केरोसिन का आवंटन सरकारी गले की दुकानों पर बंद है, तो फिर यह सवाल पैदा होता है कि भारत सरकार की पैट्रोलियम मिनिस्ट्री ने ग्रामीण क्षेत्रों और दूरस्थ क्षेत्रों में 45/दिनों की दूसरे सिलेंडर बुकिंग की बाध्यता क्यों की ….?

यदि ग्रामीण भारत और दूरस्थ क्षेत्रों में उपभोक्ता आज भी अपने लिए खाना पकाने की व्यवस्था चूल्हे पर उपले ,कोयला, लकड़ी, आदि का प्रयोग कर रहे हैं, तो यह प्रधानमंत्री मोदी जी की अति महत्वाकांक्षी योजना उज्ज्वला गैस कनेक्शन के ग्रामीण भारत और दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी आंकड़ों में दिखाए गए लाखों उपभोक्ताओं का आंकड़ा भी नकली महज खानापूर्ति लगता है, तेल कंपनियों को पैट्रोलियम मिनिस्ट्री के द्वारा 45/ दिनों बाद दूसरा सिलेंडर मिलेगा की जटिलताओं से आज पूरे ग्रामीण क्षेत्रों की उज्जवला कनेक्शन धारक महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान है, क्योंकि उनके पास एक ही गैस सिलेंडर है,और मौजूदा बरसाती मौसम में खाना बनाने के अन्य वैकल्पिक साधनों की उपलब्धता बड़ी जटिल है। उत्तराखंड राज्य में भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार और केंद्र की मोदी सरकार को, पूरे भारतवर्ष के ग्रामीण इलाकों और दूरस्थ क्षेत्रों में अचानक पैदा हुई इस समस्या के उचित समाधान पर गहनता से विचार करना चाहिए।
भारत एक प्रजातांत्रिक देश है जिसमें सबको समानता का अधिकार है, आखिर यह मापदंड किसने तय कर लिए कि किसी का गैस 25 दिन के बाद बुक होगा और किसी का 45 दिन के बाद उनके पास यह कौन सा मापक यंत्र है, यह तो सरासर आम जनमानस और ग्रामीण भारत के साथ दूरस्थ क्षेत्रों की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे लोगों के मौलिक मानवीय अधिकारों का हनन है, जिससे यह साबित होता है कि सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है।

भाष्कर द्विवेदी

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