देवभूमि उत्तराखंड में इस बार रंगों का त्योहार भी भय की छाया में मनाया जा रहा है। भालू औऱ तेंदुए के बढ़ते हमलों ने गांवों में दहशत का माहौल बना दिया है।
भालू औऱ तेंदुए के खौफ से होली की रौनक फीकी, दहशत में हैं पहाड़ , गांव औऱ ग्रामीण अब देवभूमि उत्तराखंड को समाधान चाहिए फिर एक व्यक्ति की जान तेंदुए के हमले में चली गई अब आम हो चुकी घटनाओं पर सभी मौन है लेकिन सच है कि यह पहाड़ का बिगड़ता संतुलन है। पलायन हुआ जंगल कटे औऱ वन्यजीव संकट में आये , हमारे लोगो को जानवरो ने नहीं मारा अव्यवस्थित वन नीति ने मारा है अभी ये चेतावनी है
संवेदनशील क्षेत्रों में रात्रि गश्त और अलर्ट सिस्टम क्यों नहीं? जंगलों की वैज्ञानिक मैपिंग कब होगी?
प्रभावित परिवार को त्वरित और सम्मानजनक मुआवज़ा क्यों नहीं मिलता?
क्या स्थानीय युवाओं को वन सुरक्षा स्वयंसेवक के रूप में प्रशिक्षित किया गया?
वन्यजीव संरक्षण जरूरी है लेकिन मानव जीवन उससे क़ई महत्वपूर्ण है “पहाड़ का आदमी डर में जी रहा है न जल सुरक्षित , न जंगल सुरक्षित, न जन।” संतुलित विकास का अर्थ केवल सड़क और प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि मानव समाज भी है ।
अभी समय है नहीं तो यह संकट और गहरा होगा।
