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हनुमान ध्वजा विस्थापन के साथ संपन्न हुआ भव्य रामलीला महोत्सव:  एक करोड़ दर्शकों के लक्ष्य के करीब पहुँचा आयोजन

1952 की टिहरी की ऐतिहासिक रामलीला परंपरा को देहरादून में मिला नया आयाम, ध्वजा विस्थापन के साथ महोत्सव का समापन

आस्था, संस्कृति और आधुनिक तकनीक का संगम बनी भव्य रामलीला, डिजिटल मंचों पर एक करोड़ दर्शकों तक पहुँचने का लक्ष्य

गढ़वाल की 1952 की ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार हुआ हनुमान ध्वजा विस्थापन, एक करोड़ दर्शकों के लक्ष्य के करीब पहुँची ‘भव्य रामलीला महोत्सव–2026’

11 दिवस, 11 सामाजिक संदेश और ऐतिहासिक उपलब्धियाँ—हनुमान ध्वजा विस्थापन के साथ संपन्न हुआ भव्य रामलीला महोत्सव

श्री रामकृष्ण लीला समिति टिहरी 1952, देहरादून (पंजीकृत) द्वारा गढ़वाल की ऐतिहासिक राजधानी पुरानी टिहरी की वर्ष 1952 से चली आ रही प्राचीन रामलीला परंपरा को टिहरी के जलमग्न होने के बाद देहरादून में पुनर्जीवित करने के संकल्प के साथ आयोजित ‘भव्य रामलीला महोत्सव–2026’ के सफल आयोजन के उपरांत गढ़वाल की प्राचीन परंपरा के अनुसार विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हनुमान ध्वजा का विस्थापन किया गया। श्री गुरु नानक मैदान, रेसकोर्स, देहरादून में आयोजित इस महोत्सव ने धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत, आधुनिक तकनीक और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया।

समिति के अध्यक्ष अभिनव थापर ने कहा कि वर्ष 1952 से पुरानी टिहरी में रामलीला के निर्विघ्न आयोजन की कामना के साथ जन्माष्टमी पर हनुमान ध्वजा की विधिवत स्थापना की जाती थी तथा रामलीला संपन्न होने के बाद पूजा-अर्चना एवं हवन के साथ ध्वजा का विस्थापन किया जाता था। समिति ने उसी ऐतिहासिक परंपरा का निर्वहन करते हुए देहरादून में इस वर्ष भी आयोजन को सफलतापूर्वक संपन्न किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम एवं श्री हनुमान जी के आशीर्वाद, कलाकारों की साधना, समिति के सदस्यों के परिश्रम और श्रद्धालुओं के सहयोग से यह ऐतिहासिक आयोजन नई ऊँचाइयों तक पहुँचा है।

इस वर्ष 11 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2026 तक आयोजित रामलीला महोत्सव में प्रत्येक दिवस को एक विशेष सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय सरोकार से जोड़कर मनाया गया। प्रथम दिवस ‘लोक संस्कृति दिवस’, द्वितीय दिवस ‘मातृशक्ति दिवस’, तृतीय दिवस ‘राज्य आंदोलनकारी सम्मान दिवस’, चतुर्थ दिवस ‘धर्म सम्मान दिवस’, पंचम दिवस ‘धर्म शक्ति दिवस’, षष्ठम दिवस ‘गंगा-जमुना दिवस’, सप्तम दिवस ‘हिमालय संरक्षण दिवस’, अष्टम दिवस ‘कामगार दिवस’, नवम दिवस ‘साहित्य, फिल्म एवं टेलीविज़न दिवस’, दशम दिवस ‘विजय दिवस’ तथा एकादश दिवस ‘कलाकार सम्मान समारोह एवं पुरस्कार वितरण दिवस’ के रूप में आयोजित किया गया। इन दिवसों के माध्यम से लोक कलाकारों, मातृशक्ति, राज्य आंदोलनकारियों, धर्म एवं संस्कृति से जुड़ी हस्तियों, पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं, कामगारों, साहित्यकारों, फिल्म कलाकारों और टेलीविज़न जगत की प्रतिभाओं को मंच प्रदान कर सम्मानित किया गया। रामलीला के प्रत्येक प्रसंग के माध्यम से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता, पर्यावरण संरक्षण, श्रमिक सम्मान, साहित्य, कला और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का संदेश जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया गया।

रामलीला के मंचन को आधुनिक लेज़र तकनीक, विशाल LED स्क्रीन, डिजिटल इफेक्ट्स और लाइव प्रसारण के माध्यम से अत्यंत भव्य स्वरूप दिया गया। राम–रावण युद्ध, मेघनाथ वध, कुंभकर्ण वध, हनुमान जी का नागपाश प्रसंग, लक्ष्मण रेखा, सीता हरण एवं अग्नि परीक्षा सहित विभिन्न प्रसंगों को अत्याधुनिक तकनीक से प्रस्तुत किया गया। उत्तराखंड में पहली बार LED एवं लेज़र तकनीक से सजे 80 फीट ऊँचे रावण के पुतले तथा मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन ने आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान किया। पारंपरिक रामलीला की मूल भावना को बनाए रखते हुए आधुनिक तकनीक का ऐसा संयोजन दर्शकों के लिए अविस्मरणीय अनुभव बना।

समिति के अध्यक्ष अभिनव थापर ने कहा कि वर्ष 2025 में इस ऐतिहासिक रामलीला को डिजिटल माध्यमों से 82 लाख से अधिक दर्शकों ने देखा था, जिसके चलते यह उत्तराखंड की सबसे अधिक देखी जाने वाली रामलीला बनी। इसी उपलब्धि को आगे बढ़ाते हुए समिति ने वर्ष 2026 में एक करोड़ से अधिक दर्शकों तक पहुँचने का लक्ष्य निर्धारित किया। रामलीला का प्रसारण एवं प्रचार-प्रसार 30 से अधिक डिजिटल चैनलों, मीडिया पोर्टलों एवं विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के माध्यम से किया गया। इस वर्ष के आयोजन में रामलीला समिति एक करोड़ से अधिक दर्शकों तक पहुँचने के अपने निर्धारित लक्ष्य के करीब पहुँच चुकी है। यह उपलब्धि पुरानी टिहरी की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत और उत्तराखंड की समृद्ध लोकपरंपराओं को देश-दुनिया तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अभिनव थापर ने आगे कहा कि पुरानी टिहरी की ऐतिहासिक रामलीला को देहरादून में पुनर्जीवित करना केवल एक धार्मिक आयोजन करना नहीं, बल्कि जलमग्न हो चुकी टिहरी की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकपरंपराओं और ऐतिहासिक पहचान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रयास है। समिति का संकल्प है कि आगामी वर्षों में इस महोत्सव को और अधिक भव्य, व्यापक एवं तकनीकी रूप से उन्नत बनाया जाए, ताकि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिले। उन्होंने सभी कलाकारों, पदाधिकारियों, सहयोगियों, स्वयंसेवकों, मीडिया संस्थानों एवं दर्शकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सभी के सामूहिक प्रयासों से यह ऐतिहासिक परंपरा निरंतर नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करती रहेगी।

हनुमान ध्वजा विस्थापन के विधि-विधान से आयोजित पूजा-अर्चना कार्यक्रम में समिति के अध्यक्ष अभिनव थापर, सचिव अमित पंत, नरेश कुमार, गिरीश पैन्यूली, अजय पैन्यूली सहित समिति के अन्य सदस्य उपस्थित रहे। पूजा-अर्चना एवं ध्वजा विस्थापन की धार्मिक विधियाँ पंडित शिवम शास्त्री एवं पंडित अमित मिश्रा द्वारा वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न कराई गईं। इस अवसर पर भगवान श्री हनुमान जी का स्मरण करते हुए आगामी वर्ष में भी ‘भव्य रामलीला महोत्सव’ के और अधिक भव्य एवं सफल आयोजन की कामना की गई तथा पुरानी टिहरी की ऐतिहासिक एवं गौरवशाली रामलीला परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया गया।

*जय श्री राम! 🚩*

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