
उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के “मेरे सपनों का उत्तराखंड” युवा संवाद कार्यक्रम पर तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जी आज युवाओं से उनके सपने पूछ रहे हैं, लेकिन प्रदेश का युवा उनसे पूछ रहा है कि हमारे सपनों को रोजगार में बदलने के लिए आपकी सरकार ने पिछले वर्षों में क्या किया?
गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि मुख्यमंत्री का युवाओं से सपने पूछना अच्छा लगता है, लेकिन सवाल यह है कि जिस युवा के हाथ में डिग्री है, लेकिन नौकरी नहीं; जो भर्ती परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगा रहा है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया विवादों में घिर जाती है; जो पहाड़ से पलायन करने को मजबूर है—वह मुख्यमंत्री को अपना सपना बताए या अपनी मजबूरी?
उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जी को युवाओं से “मेरे सपनों का उत्तराखंड” पूछने से पहले “मेरी सरकार ने उत्तराखंड के युवाओं के लिए क्या किया” नाम से एक संवाद करना चाहिए था। अगर सरकार सच में युवाओं की आवाज सुनना चाहती है तो मंच पर भाषण और सुझाव लेने के बजाय युवाओं के इन सवालों का सीधा जवाब दे।
उन्होंने कहा कि सरकार रोजगार के आंकड़े गिनाकर अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन प्रदेश का युवा जानना चाहता है कि कितने युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार मिला, कितनी भर्तियां समय पर और पारदर्शी तरीके से पूरी हुईं, कितने पद आज भी खाली हैं और पहाड़ के कितने युवाओं को उनके घर के आसपास रोजगार मिला?
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि उत्तराखंड का युवा केवल सरकारी नौकरी नहीं मांग रहा। वह बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था, स्थानीय स्तर पर रोजगार, सुरक्षित भविष्य और पलायन रोकने की ठोस नीति मांग रहा है। युवाओं को भाषण नहीं, अवसर चाहिए; घोषणाएं नहीं, परिणाम चाहिए।
उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल किया कि यदि सरकार ने युवाओं के लिए इतना काम किया है तो फिर पलायन, बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर युवाओं की बेचैनी क्यों कायम है? आखिर क्यों प्रदेश का पढ़ा-लिखा युवा दूसरे राज्यों की ओर जाने को मजबूर है?
गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा
“मुख्यमंत्री जी, युवाओं के सपनों का डेटा इकट्ठा करने से पहले उनकी हकीकत का सामना कीजिए। उत्तराखंड का युवा अब ‘सपनों का उत्तराखंड’ नहीं, ‘मौकों का उत्तराखंड’ चाहता है। उसे यह नहीं सुनना कि सरकार क्या सपना देख रही है—वह जानना चाहता है कि उसके अपने सपने कब पूरे होंगे।”
उन्होंने कहा कि 2027 के चुनाव की तैयारी में सरकार जितने चाहे संवाद कर ले, लेकिन उत्तराखंड का युवा 2026 में ही अपना हिसाब-किताब तैयार कर रहा है। सोशल मीडिया के मंचों और सरकारी कार्यक्रमों में युवाओं की बातें सुनने से ज्यादा जरूरी है कि उनकी समस्याओं पर जमीन पर काम दिखाई दे।
युवा संवाद तभी सार्थक होगा जब युवाओं के सवालों का जवाब भी मिलेगा। वरना यह संवाद कम और चुनावी फोटो-ऑप ज्यादा नजर आएगा।
