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“बहुत देर कर दी मेहरबां आते आते, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”- गरिमा

 

उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने धामी सरकार द्वारा तथाकथित हिंदूवादी संगठनों की मोरल पुलिसिंग पर रोक लगाने संबंधी निर्देशों को सरकार की “देर से आई स्वीकारोक्ति” करार दिया है।

गरिमा दसौनी ने कहा कि धामी सरकार का यह निर्देश अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पिछले कई वर्षों से उत्तराखंड में तथाकथित हिंदूवादी संगठनों को खुली छूट और राजनीतिक संरक्षण दिया जाता रहा। सवाल यह है कि यदि मोरल पुलिसिंग गलत थी, यदि आम जनता को डराना-धमकाना गलत था, यदि शोरूमों में घुसकर अराजकता फैलाना गलत था — तो पिछले 9 वर्षों तक सरकार चुप क्यों रही?

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की जनता ने लगातार देखा है कि किस प्रकार कुछ संगठन कानून हाथ में लेकर सड़कों पर भय और उन्माद का माहौल बनाते रहे। “कभी दुकानों में घुसकर उत्पात मचाना, कभी युवाओं को रोकना-टोकना, कभी सामाजिक और धार्मिक तनाव पैदा करना — और सरकार हर बार मूकदर्शक बनी रही।

गरिमा ने आरोप लगाया कि अब जबकि चुनाव नजदीक हैं, भाजपा सरकार की छवि पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, निवेश और पर्यटन प्रभावित हो रहा है, इसलिए प्रशासन को अचानक कानून और व्यवस्था की याद आने लगी है।

उन्होंने कहा कि “सच्चाई यह है कि ये संगठन भाजपा की ‘बी टीम’ की तरह काम करते रहे और राजनीतिक एजेंडे को हवा देते रहे। चुनावी लाभ के लिए पूरे प्रदेश को धार्मिक उन्माद की प्रयोगशाला बनाने का प्रयास किया गया।”

कांग्रेस नेत्री ने स्पष्ट कहा कि “उत्तराखंड देवभूमि है, अराजकता की भूमि नहीं। यहां कानून का राज होना चाहिए, किसी संगठन विशेष का नहीं। यदि सरकार वास्तव में गंभीर है तो केवल निर्देश जारी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि पिछले वर्षों में कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई भी करनी होगी।

गरिमा मेहरा दसौनी

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