अब क्या कोई राजनीतिक दल या धामी सरकार यह तय करेगी कि मेरी आस्था क्या है? क्या सिख होने या गैर-हिंदू होने के आधार पर मुझे हर की पौड़ी या चारधाम के दर्शन से वंचित किया जाएगा? -अमरजीत सिंह
धामी सरकार लगातार समाज को बांटने की राजनीति कर रही है। इसी विभाजनकारी सोच के तहत पहले हरिद्वार की हर की पौड़ी पर प्रयोग किया गया और अब चारधाम के मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश को वर्जित करने की कोशिश की जा रही है।
यह भाजपा और आरएसएस की धर्म आधारित विभाजनकारी राजनीति का एक और प्रयोग है, जिसका उद्देश्य समाज में वैमनस्य पैदा करना है।
श्री हेमकुंड साहिब की यात्रा पर आने वाले लाखों श्रद्धालु वर्षों से अपनी यात्रा को तभी पूर्ण मानते रहे हैं, जब वे भगवान बद्रीनाथ के दर्शन भी करते थे। अब इन लाखों श्रद्धालुओं की चारधाम यात्रा पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया गया है, जो न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि भारत की साझा संस्कृति और परंपराओं के भी खिलाफ है।
सरकार यह कह रही है कि “आस्था” के आधार पर यह तय किया जाएगा कि कौन गैर-हिंदू है। धामी सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आस्था को मापने का यह नया पैमाना क्या है और इसे तय करने का अधिकार किसे दिया गया है।
उत्तराखंड का निवासी होने के नाते मैंने स्वयं कई बार श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन किए हैं तथा जागेश्वर धाम सहित अनेक प्राचीन मंदिरों में जाने का सौभाग्य प्राप्त किया है। अब क्या कोई राजनीतिक दल या धामी सरकार यह तय करेगी कि मेरी आस्था क्या है? क्या सिख होने या गैर-हिंदू होने के आधार पर मुझे हर की पौड़ी या चारधाम के दर्शन से वंचित किया जाएगा?
भारत की मूल भावना “वसुधैव कुटुंबकम्” रही है। किसी भी व्यक्ति को किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश देने या रोकने का अधिकार सरकारों को नहीं है। सरकारों का काम जनहित में कार्य करना है, न कि धार्मिक परंपराओं और आस्थाओं में हस्तक्षेप करना।
धामी सरकार को इस निर्णय पर तुरंत पुनर्विचार करना चाहिए और समाज को बांटने वाले ऐसे प्रयासों से बाज आना चाहिए।
अमरजीत सिंह
उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी
