22.6 C
Dehradun
Sunday, November 30, 2025
Google search engine
Homeराज्य समाचारअर्धकुंभ को “कुंभ” बताने का प्रयास—परंपराओं से खिलवाड़, जनता को गुमराह करने...

अर्धकुंभ को “कुंभ” बताने का प्रयास—परंपराओं से खिलवाड़, जनता को गुमराह करने की कोशिश : गरिमा

 

उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा हरिद्वार में होने वाले आगामी अर्धकुंभ को “कुंभ” बताने की कोशिश न केवल परंपराओं से छेड़छाड़ है, बल्कि यह धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक सत्य के साथ किया गया एक गंभीर खिलवाड़ भी है। धार्मिक परंपराओं को राजनीतिक लाभ के लिए तोड़ा-मरोड़ा नहीं जा सकता यह कहना है उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी का
दसौनी ने कहा कि हमारे वेद–पुराण में अर्धकुंभ और कुंभ की स्पष्ट परिभाषा दी गई है।
हमारे शास्त्रों और पुराणों में कुंभ पर्व को सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के विशिष्ट योग से बनने वाला एक अद्वितीय खगोलीय आयोजन माना गया है।
कुंभ मेला प्रत्येक 12 वर्ष में होता है।
वहीं अर्धकुंभ 6 वर्षों के अंतराल पर आयोजित किया जाने वाला अर्ध-पर्व है, जिसकी मान्यता अलग और स्पष्ट है।
भारत की परंपरा में कहीं भी अर्धकुंभ को कुंभ माना जाना या कहा जाना शास्त्रीय रूप से प्रमाणित नहीं है। ऐसा करना न केवल धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि करोड़ों आस्थावानों के विश्वास से खेलना भी है।
गरिमा ने राज्य की धामी सरकार को कटघरे में खड़ा कर पूछा की जल्दबाजी क्या है—क्या छिपाना चाहती है सरकार?
गरिमा ने कहा पहले ही भाजपा सरकार के दौरान कुंभ घोटाले से उत्तराखंड की साख को राष्ट्रीय स्तर पर आघात लगा है। अब यदि अर्धकुंभ को बिना किसी शास्त्रीय आधार के “कुंभ” घोषित किया जाता है, तो यह कदम
परंपराओं की अवहेलना,
संत समाज की अनदेखी,
और बड़े स्तर पर धार्मिक आयोजनों का भ्रमित प्रचार साबित होगा।
गरिमा ने कहा कि यह वही सरकार है जो हर असफलता को चमकाने के लिए परंपराओं का सहारा लेती है, लेकिन जब वास्तविक चुनौती आती है, तब या तो इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करती है या जनता को गलत जानकारी देकर भ्रम फैलाती है।
गरिमा ने कहा कि इस फैसले से संत समाज में भी असंतोष दिखाई दे रहा है।संत समाज का भी मानना है कि
अर्धकुंभ को अर्धकुंभ ही कहा जाना चाहिए,परंपरागत नाम, स्वरूप और महत्व में बदलाव स्वीकार्य नहीं।
गरिमा ने कहा कि धार्मिक आयोजनों को “शासन–प्रचार” का मंच बनाना अस्वीकार्य है।
यह आवाज हर उस श्रद्धालु की है जिसके लिए धर्म राजनीति का उपकरण नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है।
धार्मिक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक रीढ़ हैं—
उन्हें राजनीतिक स्टंट बनाना निंदनीय है।
अर्धकुंभ को अर्धकुंभ ही कहा जाएगा।
सत्य, शास्त्र और परंपरा—इन्हीं के आधार पर धार्मिक निर्णय लिए जाने चाहिए, न कि प्रचार–प्रबंधन और राजनीतिक लोभ के आधार पर।

— गरिमा मेहरा दसौनी
मुख्य प्रवक्ता, उत्तराखंड कांग्रेस

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

STAY CONNECTED

123FansLike
234FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest News