हम सभी देशवासी भाषाई विविधता के बीच, आंदोलनकाल में जन-सेतु हेतु एकीकृत हिंदी का प्रयोग करें।”
भारत एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र है, उदाहरण उत्तराखंड ही जिसमें अनेक भाषा हैं जैसे गढ़वाली, कुमांउनी, जौनसारी, जौनपुरी, जौहार मुनस्यारी, रवांल्टी, बंगाड़ी, मार्च्छा, राजी, जाड़, रंग ल्वू, बुक्साणी और थारू शामिल हैं अनेकों उप-बोलियाँ भाषा—जैसे टिहरी गढ़वाली, श्रीनगरी गढ़वाली, रवाईं, रुद्रप्रयाग नागपुरिया, सल्ट–कफोलसू, जौनसारी आदि कुमाऊँ सीमा की नागपुरिया गढ़वाली, उत्तरकाशी की रवाईं, भिलंगना क्षेत्र की बोलचाल, पौड़ी की खाल–पट्टी की गढ़वाली, चमोली/जौनसार–बाबर की प्रभावशाली बोली, सल्ट/कफोलस्यूं की कुमाऊंनी आदि
हम सभी जानते हैं कि शब्द, उच्चारण, लहजा और अभिव्यक्ति में इन बोलियों का अपना-अपना स्थानीय स्थायी स्वरूप है। इसी भाषाई विविधता के कारण पूरे प्रदेश में एक “मानक” तय नहीं हो पाया। न कोई साझा व्याकरण बना, न शाशन स्तर से इन्हें कोई तयशुदा एकीकृत रूप दिया गया
हम सभी के मुद्दे तो एक है लेकिन यह भाषाई विविधता के कारण संकट पैदा हो रहा है
हमारी विविधता सांस्कृतिक विरासत तो है, लेकिन संचार और आंदोलन के स्तर पर एक समान भाषा को अपनाने में बहुत चुनौती है।
— हम सभी “वर्तमान जनआंदोलनों के दौर में सर्वसम्मति से हिंदी को जनभाषा के रूप में अपनाए औऱ सम्पूर्ण प्रदेश में आंदोलन संवाद और संघर्ष हिंदी स्वर में, स्पष्ट और प्रभावी एकीकृत रूप से करें इससे आशा है कि बड़ी चुनौतियों में भी हम सभी एकजुट दिखेंगे।”
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साथियों 350 वर्षों पहले 1675 में धर्म, मानवीय मूल्यों और अधिकारों की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर द्वारा दिया बलिदान अमर रहे ।
सचिन थपलियाल
पूर्व महासचिव
छात्रसंघ डीएवी कॉलेज देहरादून।।
प्रदेश अध्यक्ष
आम आदमी पार्टी उत्तराखंड युवा मोर्चा
